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सुप्रीम कोर्ट ने महर्षि महेश योगी सोसाइटी की जमीन बिक्री मामले में SIT जांच का आदेश दिया, हाईकोर्ट की रोक हटाई

सुप्रीम कोर्ट ने महर्षि महेश योगी से जुड़ी संस्था की जमीनों की कथित फर्जी बिक्री मामले में SIT जांच का आदेश देते हुए चार्जशीट पर लगी रोक हटा दी। - श्रीकांत ओझा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य।

Rajan Prajapati
सुप्रीम कोर्ट ने महर्षि महेश योगी सोसाइटी की जमीन बिक्री मामले में SIT जांच का आदेश दिया, हाईकोर्ट की रोक हटाई

सुप्रीम कोर्ट ने महर्षि महेश योगी से जुड़ी संस्था की संपत्तियों की कथित फर्जी बिक्री और धोखाधड़ी के मामलों में गंभीर चिंता जताते हुए उत्तर प्रदेश सरकार को विशेष जांच दल (SIT) गठित करने का निर्देश दिया है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जांच एजेंसी को चार्जशीट दाखिल करने से रोकना उचित नहीं था।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला स्पिरिचुअल रीजनरेशन मूवमेंट फाउंडेशन ऑफ इंडिया नामक संस्था से जुड़ा है, जिसकी स्थापना महर्षि महेश योगी के मार्गदर्शन में की गई थी। संस्था के पास कई राज्यों में बड़ी मात्रा में जमीन होने का दावा किया गया।

याचिकाकर्ता की ओर से आरोप लगाया गया कि कुछ लोगों ने कथित तौर पर फर्जी दस्तावेज और पावर ऑफ अटॉर्नी का इस्तेमाल कर संस्था की जमीनें बेच दीं। इस संबंध में उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश समेत विभिन्न राज्यों में कई FIR दर्ज हैं।

विवादित FIR नंबर 642/2025 नोएडा सेक्टर-39 थाने में दर्ज हुई थी। आरोप था कि संस्था की जमीन M/s सिंहवाहिनी इन्फ्राप्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड को बेची गई, जिसके निदेशकों में एक हाईकोर्ट याचिकाकर्ता भी शामिल थे।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फरवरी 2026 में पारित अंतरिम आदेश में पुलिस जांच जारी रखने की अनुमति दी थी, लेकिन BNSS की धारा 193(3) के तहत पुलिस रिपोर्ट या चार्जशीट दाखिल करने पर रोक लगा दी थी। इसी आदेश को चुनौती देते हुए शिकायतकर्ता सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे।

न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने कहा कि केवल यह कह देना कि मामला “सिविल विवाद” है, अपने आप में आपराधिक जांच रोकने का आधार नहीं बन सकता, खासकर तब जब कई FIR और अलग-अलग राज्यों में समान आरोप सामने आए हों।

पीठ ने कहा,

“समाज की संपत्तियों को लगातार बेचे जाने और विभिन्न अदालतों के आदेशों के बावजूद लेनदेन जारी रहने की स्थिति गंभीर चिंता का विषय है।”

अदालत ने यह भी माना कि हाईकोर्ट आरोपियों को गिरफ्तारी से अस्थायी राहत दे सकता है, लेकिन जांच पूरी होने के बाद चार्जशीट दाखिल करने पर रोक लगाना उचित नहीं था।

पीठ ने टिप्पणी की,

“प्रदन्या प्रांजल कुलकर्णी मामले का हवाला देकर चार्जशीट दाखिल करने पर रोक लगाने का कोई आधार नहीं बनता।”

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भूमि घोटालों और कथित संगठित गतिविधियों की निष्पक्ष जांच आवश्यक है। अदालत ने उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव की निगरानी में SIT गठित करने का निर्देश दिया, जिसमें सोसायटी रजिस्ट्रार को भी सदस्य बनाया जाएगा।

SIT को यह जांच करने को कहा गया कि संस्था की जमीनें किन परिस्थितियों में और किन लोगों द्वारा बेची गईं। अदालत ने तीन महीने के भीतर रिपोर्ट तैयार कर संबंधित पुलिस को सौंपने का निर्देश दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस हिस्से को रद्द कर दिया जिसमें चार्जशीट दाखिल करने पर रोक लगाई गई थी। अदालत ने जांच अधिकारी को FIR No. 642/2025 में जांच पूरी कर रिपोर्ट दाखिल करने की अनुमति दी।

हालांकि, अदालत ने यह भी कहा कि SIT रिपोर्ट आने और जांच पूरी होने तक प्रतिवादी संख्या-2 के खिलाफ कोई कठोर कार्रवाई नहीं की जाएगी, बशर्ते वह जांच में सहयोग करे।

Case Details

Case Title: Shrikant Ojha v. State of UP & Ors.

Case Number: Criminal Appeal arising out of SLP (Crl.) No. 3123 of 2026

Judges: Justice J.K. Maheshwari and Justice Atul S. Chandurkar

Decision Date: May 12, 2026

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