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नाबालिग बेटी का भरण-पोषण पिता की प्राथमिक जिम्मेदारी: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने ₹8,000 मासिक अंतरिम भरण-पोषण बरकरार रखा

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कहा कि मां के कमाने के बावजूद पिता नाबालिग बच्चे के भरण-पोषण से मुक्त नहीं हो सकता, ₹8,000 मासिक अंतरिम भरण-पोषण बरकरार। - दीपक कुमार बनाम उत्तराखंड राज्य और अन्य

Shivam Y.
नाबालिग बेटी का भरण-पोषण पिता की प्राथमिक जिम्मेदारी: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने ₹8,000 मासिक अंतरिम भरण-पोषण बरकरार रखा

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में स्पष्ट किया कि नाबालिग बच्चे के भरण-पोषण की जिम्मेदारी से पिता केवल इस आधार पर मुक्त नहीं हो सकता कि मां भी नौकरी करती है। अदालत ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें पिता को ₹8,000 प्रति माह अंतरिम भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया था।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला दीपक कुमार बनाम राज्य एवं अन्य से जुड़ा है, जिसमें याचिकाकर्ता ने फैमिली कोर्ट, रुड़की के 24 जुलाई 2023 के आदेश को चुनौती दी थी। इस आदेश में नाबालिग बच्ची के पक्ष में अंतरिम भरण-पोषण तय किया गया था।

रिकॉर्ड के अनुसार, पति-पत्नी का विवाह 2018 में हुआ था और उनसे एक पुत्री का जन्म हुआ। बाद में पारिवारिक विवाद उत्पन्न होने पर मां ने धारा 125 सीआरपीसी के तहत भरण-पोषण का दावा किया, जिसमें अंतरिम राहत भी मांगी गई।

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पिता की ओर से यह दलील दी गई कि दोनों ही माता-पिता सरकारी सेवा में हैं पिता सीआरपीएफ में और मां सीआईएसएफ में कार्यरत हैं ऐसे में पूरा भार केवल पिता पर डालना उचित नहीं है।

यह भी कहा गया कि उनकी आय से लोन की किस्तें और पारिवारिक जिम्मेदारियां पूरी होती हैं, जिससे वास्तविक आय कम हो जाती है। इसके अलावा, मां द्वारा अपनी पूरी आय का खुलासा न करने का आरोप भी लगाया गया।

न्यायमूर्ति आशिष नैथानी की पीठ ने स्पष्ट किया कि धारा 125 सीआरपीसी एक सामाजिक न्याय का प्रावधान है, जिसका उद्देश्य आश्रितों को अभाव से बचाना है।

अदालत ने कहा,

“पिता का नाबालिग बच्चे के प्रति भरण-पोषण का दायित्व सर्वोपरि है और इसे केवल इस आधार पर टाला नहीं जा सकता कि मां भी आय अर्जित कर रही है।”

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कोर्ट ने यह भी माना कि भले ही मां की आय को ध्यान में रखा जाना चाहिए, लेकिन इससे पिता की जिम्मेदारी समाप्त नहीं होती।

लोन की किस्तों और अन्य निजी खर्चों पर अदालत ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा, “स्वैच्छिक वित्तीय दायित्व नाबालिग बच्चे के अधिकारों से ऊपर नहीं हो सकते।”

साथ ही, अदालत ने यह भी जोड़ा कि बच्चे की शिक्षा, स्वास्थ्य और पोषण की जरूरतों को देखते हुए ₹8,000 की राशि न तो अत्यधिक है और न ही मनमानी।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अंतरिम भरण-पोषण आवेदन की तारीख से देना अदालत के विवेकाधिकार में आता है। इस मामले में ऐसा करने में कोई कानूनी त्रुटि नहीं पाई गई।

अदालत ने पाया कि फैमिली कोर्ट का आदेश न तो अवैध है और न ही मनमाना।

इसलिए हाईकोर्ट ने आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को खारिज करते हुए कहा कि हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता। साथ ही, ₹8,000 प्रति माह अंतरिम भरण-पोषण देने का आदेश यथावत रखा गया।

Case Details

Case Title: Deepak Kumar vs State of Uttarakhand & Another

Case Number: Criminal Revision No. 686 of 2023

Judge: Justice Ashish Naithani

Decision Date: 11 March 2026

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