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पत्नी कमाने वाली हो तब भी वह वैवाहिक जीवन के स्तर को बनाए रखने के लिए पति से भरण-पोषण की हकदार है: बॉम्बे हाईकोर्ट

बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि यदि पत्नी कमाती भी है, तब भी वह पति से भरण-पोषण की हकदार है ताकि वह वैवाहिक जीवन में मिले जीवन स्तर को बनाए रख सके। कोर्ट ने ₹15,000 मासिक भरण-पोषण आदेश को बरकरार रखा।

Shivam Y.
पत्नी कमाने वाली हो तब भी वह वैवाहिक जीवन के स्तर को बनाए रखने के लिए पति से भरण-पोषण की हकदार है: बॉम्बे हाईकोर्ट

बॉम्बे हाईकोर्ट ने हाल ही में यह निर्णय दिया कि यदि पत्नी स्वयं भी कमा रही हो, तब भी वह अपने पति से भरण-पोषण की हकदार है ताकि वह उसी जीवन स्तर को बनाए रख सके जैसा वह वैवाहिक जीवन में जी रही थी। यह अहम फैसला न्यायमूर्ति मंजुषा देशपांडे ने 18 जून 2025 को SKPS बनाम PSS (रिट याचिका संख्या 16275/2023) में सुनाया, जिसमें पति ने बांद्रा फैमिली कोर्ट द्वारा पारित ₹15,000 मासिक भरण-पोषण आदेश को चुनौती दी थी।

“सिर्फ इस वजह से कि पत्नी कमा रही है, उसे उस जीवन स्तर के अनुरूप अपने पति से सहायता से वंचित नहीं किया जा सकता, जिसकी वह अपने वैवाहिक घर में आदी रही है।”
न्यायमूर्ति मंजुषा देशपांडे

इस मामले में फैमिली कोर्ट ने पत्नी को ₹15,000 प्रति माह अंतरिम भरण-पोषण देने का आदेश दिया था। पति ने दलील दी कि पत्नी स्कूल टीचर और ट्यूशन से लगभग ₹40,000 मासिक कमा रही है और उसके ऊपर माता-पिता की जिम्मेदारी सहित उसके खुद के खर्च भी अधिक हैं।

हालांकि, कोर्ट ने पति की आय और खर्चों को लेकर किए गए दावों में विसंगतियां पाईं। न्यायालय ने पाया कि पति ने अपनी सैलरी ₹57,935 दिखाई जबकि पत्नी द्वारा दाखिल वेतन पर्चियों से यह स्पष्ट हुआ कि कुछ महीनों में वह ₹1.5 लाख से अधिक कमा रहा है। इसके अलावा, उसके पिता को ₹28,000 मासिक पेंशन मिल रही है, जिससे यह भी स्पष्ट हुआ कि माता-पिता पूरी तरह उस पर निर्भर नहीं हैं।

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“पति और पत्नी की आय में भारी असमानता है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।”
न्यायमूर्ति मंजुषा देशपांडे

कोर्ट ने कहा कि पत्नी ₹18,000 मासिक कमा रही है लेकिन यह आय स्वतंत्र जीवन जीने के लिए पर्याप्त नहीं है। उसे अपनी नौकरी के लिए प्रतिदिन लंबी दूरी तय करनी पड़ती है और वह इस समय अपने भाई के घर पर माता-पिता के साथ रह रही है, जो दीर्घकालिक व्यवस्था नहीं हो सकती।

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न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के प्रवीण कुमार जैन बनाम अंजू जैन मामले में दिए गए निर्णय का हवाला दिया जिसमें कहा गया कि पत्नी की जीवनशैली, आय असमानता और दोनों पक्षों की वित्तीय स्थिति जैसे कारकों को ध्यान में रखकर भरण-पोषण तय किया जाना चाहिए।

“यदि पत्नी कुछ आय अर्जित कर भी रही हो, तब भी वह अपने वैवाहिक जीवन में मिले जीवन स्तर के अनुसार भरण-पोषण की हकदार है।”
— बॉम्बे हाईकोर्ट

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अंततः, हाईकोर्ट ने पति की याचिका खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा और कहा कि पत्नी को सम्मानजनक जीवन जीने के लिए वित्तीय सहायता की आवश्यकता है।

उपस्थिति:

  • पति की ओर से अधिवक्ता शशिपाल शंकर प्रस्तुत हुए।
  • पत्नी की ओर से अधिवक्तागण एस.एस. दुबे एवं नागेन्द्र दुबे उपस्थित हुए।

मामले का शीर्षक: SKPS बनाम PSS (रिट याचिका संख्या 16275/2023)

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