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पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाना अपराध नहीं है: मद्रास उच्च न्यायालय ने दो आरोपियों के खिलाफ आपराधिक मामला रद्द किया

मद्रास हाईकोर्ट ने दो व्यक्तियों के खिलाफ दर्ज आपराधिक कार्यवाही रद्द करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपित अपराधों के आवश्यक कानूनी तत्व स्थापित करने में विफल रहा। - थॉमस @ धामस और अन्य। बनाम तमिलनाडु राज्य और अन्य।

Shivam Y.
पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाना अपराध नहीं है: मद्रास उच्च न्यायालय ने दो आरोपियों के खिलाफ आपराधिक मामला रद्द किया

मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ ने दो व्यक्तियों के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष द्वारा लगाए गए आरोपों में उन अपराधों के आवश्यक कानूनी तत्व ही मौजूद नहीं हैं, जिनके आधार पर मामला दर्ज किया गया था।

न्यायमूर्ति एल. विक्टोरिया गौरी की पीठ ने थॉमस उर्फ धामस और लिंगाबालन द्वारा दायर याचिका स्वीकार करते हुए यह आदेश पारित किया।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला रामनाथपुरम जिले के परमकुडी तालुक पुलिस स्टेशन में वर्ष 2023 में दर्ज एक एफआईआर से जुड़ा था। पुलिस का आरोप था कि 1 जनवरी 2023 को दोनों आरोपियों ने ड्यूटी पर तैनात एक पुलिस अधिकारी के साथ अभद्र भाषा का प्रयोग किया, उन्हें रोका, सरकारी कार्य में बाधा पहुंचाई और गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी।

जांच पूरी होने के बाद पुलिस ने भारतीय दंड संहिता की धारा 294(b), 341, 353 और 506(ii) के तहत आरोपपत्र दाखिल किया था।

दूसरी ओर, याचिकाकर्ताओं का कहना था कि यह मामला एक कथित चोरी की जांच के दौरान पुलिस अधिकारी की कार्रवाई पर सवाल उठाने के बाद प्रतिशोधस्वरूप दर्ज किया गया।

मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने आरोपपत्र और जांच रिकॉर्ड का परीक्षण किया। न्यायालय ने पाया कि अश्लील भाषा के आरोप के संबंध में अभियोजन पक्ष ने उन शब्दों का उल्लेख ही नहीं किया जिनके आधार पर धारा 294(b) लगाई गई थी।

अदालत ने कहा, “केवल यह कहना पर्याप्त नहीं है कि आरोपी ने अपशब्द कहे। अदालत को यह देखने में सक्षम होना चाहिए कि कथित शब्द कानूनी रूप से अश्लील थे या नहीं।”

धारा 341 (गलत तरीके से रोकने) के संबंध में भी अदालत को कोई ऐसा साक्ष्य नहीं मिला जिससे यह साबित हो सके कि पुलिस अधिकारी की आवाजाही वास्तव में रोकी गई थी।

न्यायालय ने कहा कि केवल सवाल पूछना, विरोध करना या बहस करना अपने आप में गलत तरीके से रोकने का अपराध नहीं बनता।

धारा 353 के तहत सरकारी कर्मचारी को उसके कर्तव्य के निर्वहन से रोकने के आरोप पर अदालत ने कहा कि इस अपराध के लिए हमला या आपराधिक बल का प्रयोग आवश्यक है। रिकॉर्ड में ऐसा कोई स्पष्ट आरोप नहीं था कि आरोपियों ने पुलिस अधिकारी पर हमला किया हो या बल प्रयोग किया हो।

अदालत ने टिप्पणी की, “पुलिस कार्रवाई की वैधता पर सवाल उठाना या मौखिक विरोध करना मात्र से धारा 353 लागू नहीं हो जाती।”

इसी प्रकार, धारा 506(ii) के तहत आपराधिक धमकी के आरोप को भी अदालत ने अपर्याप्त पाया क्योंकि कथित धमकी के सटीक शब्द और उससे उत्पन्न भय का कोई स्पष्ट विवरण रिकॉर्ड में नहीं था।

पीठ ने कहा कि जांच पूरी होने के बाद भी आरोपपत्र में लगाए गए अपराधों के आवश्यक तत्व स्थापित नहीं किए जा सके हैं।

अदालत ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा, “केवल इसलिए कि कोई नागरिक पुलिस की कार्रवाई की वैधता पर सवाल उठाता है, उसके खिलाफ आपराधिक कानून का उपयोग नहीं किया जा सकता।”

इन परिस्थितियों में अदालत ने माना कि मुकदमे को जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। परिणामस्वरूप, परमकुडी न्यायिक मजिस्ट्रेट अदालत में लंबित आपराधिक कार्यवाही को याचिकाकर्ताओं के संबंध में रद्द कर दिया गया।

Case Details:

Case Title: Thomas @ Dhamas & Anr. v. The State of Tamil Nadu & Anr.

Case Number: Crl.O.P.(MD) No. 1289 of 2026

Judge: Justice L. Victoria Gowri

Decision Date: June 1, 2026

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