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मिजो चीफ्स की जमीन पर मुआवज़े की मांग खारिज: सुप्रीम कोर्ट ने कहा-मौलिक अधिकारों के उल्लंघन का प्रमाण नहीं

मिज़ो चीफ़ काउंसिल मिज़ोरम बनाम भारत संघ एवं अन्य, सुप्रीम कोर्ट ने मिजो चीफ काउंसिल की याचिका खारिज करते हुए कहा कि मिजो चीफ्स के मौलिक अधिकारों के उल्लंघन का कोई प्रमाण रिकॉर्ड में नहीं है।

Vivek G.
मिजो चीफ्स की जमीन पर मुआवज़े की मांग खारिज: सुप्रीम कोर्ट ने कहा-मौलिक अधिकारों के उल्लंघन का प्रमाण नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने मिजोरम के पारंपरिक मिजो चीफ्स द्वारा दाखिल एक महत्वपूर्ण याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें आरोप लगाया गया था कि सरकार ने उनकी पारंपरिक भूमि का अधिग्रहण बिना उचित मुआवज़े के कर लिया। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता यह साबित करने में असफल रहे कि उनके किसी मौलिक अधिकार का उल्लंघन हुआ है।

न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने यह फैसला सुनाया।

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मामले की पृष्ठभूमि

यह याचिका मिजो चीफ काउंसिल, मिजोरम द्वारा अपने अध्यक्ष के माध्यम से दायर की गई थी। याचिका में कहा गया कि पूर्व में लुशाई हिल्स (वर्तमान मिजोरम) क्षेत्र के पारंपरिक मुखियाओं की भूमि सरकार ने अपने अधिकार में ले ली, लेकिन उसके बदले उचित मुआवज़ा नहीं दिया गया।

याचिकाकर्ताओं का दावा था कि मिजो समाज में परंपरागत रूप से प्रत्येक गांव का प्रमुख अपनी “राम” नामक भूमि का मालिक होता था। वह किसानों को खेती के लिए जमीन देता था और बदले में “फाथांग” नामक कर प्राप्त करता था।

1954 में तत्कालीन असम सरकार ने असम लुशाई हिल्स जिला (अधिग्रहण ऑफ चीफ्स राइट्स) अधिनियम, 1954 लागू किया, जिसके तहत मुखियाओं के कुछ अधिकार समाप्त कर दिए गए और उनकी भूमि राज्य के नियंत्रण में आ गई।

मुखियाओं का कहना था कि उन्हें जो मुआवज़ा दिया गया, वह केवल फाथांग से संबंधित था, जमीन के वास्तविक मूल्य का भुगतान नहीं किया गया।

याचिकाकर्ताओं ने अदालत में कहा कि:

  • मिजो चीफ्स अपने-अपने क्षेत्रों के पूर्ण स्वामी थे।
  • राज्य ने उनकी भूमि बिना वैधानिक अधिकार के अपने नियंत्रण में ले ली।
  • यह कार्रवाई उस समय के मौलिक अधिकार-विशेषकर संपत्ति के अधिकार-का उल्लंघन थी।
  • दिया गया मुआवज़ा “भ्रामक और अत्यंत कम” था।

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उन्होंने यह भी तर्क दिया कि मिजो चीफ्स को अन्य रियासतों के शासकों की तरह विशेष अधिकार और आर्थिक संरक्षण मिलना चाहिए था।

केंद्र और मिजोरम सरकार ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि:

  • मिजो चीफ्स भूमि के पूर्ण स्वामी नहीं थे बल्कि प्रशासनिक अधिकार रखने वाले मध्यस्थ थे।
  • 1954 का कानून केवल उनके प्रशासनिक और पारंपरिक अधिकारों को समाप्त करने के लिए बनाया गया था।
  • उन्हें जो मुआवज़ा दिया गया वह उन्हीं अधिकारों के नुकसान के लिए था, जमीन के स्वामित्व के लिए नहीं।

सरकार ने यह भी कहा कि याचिका कई दशक बाद दायर की गई है और इससे लंबे समय से स्थापित प्रशासनिक व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने पूरे रिकॉर्ड और ऐतिहासिक संदर्भों का अध्ययन करने के बाद कहा कि याचिकाकर्ता यह साबित नहीं कर सके कि मिजो चीफ्स भूमि के पूर्ण मालिक थे।

पीठ ने कहा कि याचिका में प्रस्तुत सामग्री से यह स्थापित नहीं होता कि सरकार ने किसी मौलिक अधिकार का उल्लंघन किया है।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जब याचिकाकर्ता अपने अधिकारों के उल्लंघन को सिद्ध ही नहीं कर पाए, तब 1954 के कानून की वैधता या अन्य संवैधानिक सवालों पर विचार करने की आवश्यकता नहीं है।

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अंततः अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता मिजो चीफ्स के मौलिक अधिकारों के उल्लंघन को सिद्ध करने में असफल रहे हैं।

पीठ ने कहा: “याचिकाकर्ता मिजो चीफ्स के मौलिक अधिकारों के किसी भी उल्लंघन को स्थापित नहीं कर सके। इसलिए उन्हें मांगी गई राहत नहीं दी जा सकती।”

इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया।

Case Title: Mizo Chief Council Mizoram v. Union of India & Ors.

Case No.: Writ Petition (Civil) No. 22 of 2014

Decision Date: 13 March 2026

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