सुप्रीम कोर्ट ने एक पुराने भ्रष्टाचार मामले में अहम फैसला सुनाते हुए एक्साइज विभाग के एक कांस्टेबल की दोषसिद्धि को बरकरार रखा है। हालांकि, अदालत ने आरोपी की मौजूदा उम्र और मामले की परिस्थितियों को देखते हुए सजा की अवधि में कुछ राहत दी है।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट द्वारा रिकॉर्ड किए गए सबूतों में कोई गंभीर कमी नहीं पाई गई, इसलिए दोषसिद्धि में दखल देने का कोई आधार नहीं बनता।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला उत्तराखंड के उधम सिंह नगर जिले से जुड़ा है। आरोपी राज बहादुर सिंह उस समय एक्साइज विभाग में कांस्टेबल के पद पर तैनात थे।
रिकॉर्ड के अनुसार, शिकायतकर्ता कश्मीर सिंह पर अवैध शराब बनाने का संदेह था और पहले भी उस पर कार्रवाई हो चुकी थी। 16 जून 1990 को गांव में एक्साइज विभाग की छापेमारी हुई। इसी दौरान आरोपी ने कथित रूप से शिकायतकर्ता से कहा कि यदि वह 500 रुपये नहीं देगा तो उसके खिलाफ चालान भेज दिया जाएगा।
शिकायतकर्ता ने बाद में पुलिस सतर्कता विभाग से संपर्क किया और रिश्वत मांगने की शिकायत दर्ज कराई। इसके बाद ट्रैप की योजना बनाई गई।
विजिलेंस टीम ने शिकायतकर्ता को पांच सौ रुपये के पांच नोट दिए, जिन पर फिनॉलफ्थेलीन पाउडर लगाया गया था।
19 जून 1990 को खटीमा के एक रेस्टोरेंट में ट्रैप बिछाया गया। जैसे ही आरोपी ने शिकायतकर्ता से पैसे लिए, टीम ने मौके पर उसे पकड़ लिया।
अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार, आरोपी के हाथों को सोडियम कार्बोनेट घोल में धोया गया, जो गुलाबी हो गया। यह इस बात का संकेत था कि नोटों पर लगाया गया पाउडर उसके हाथों पर लग गया था।
ट्रायल कोर्ट ने 2006 में आरोपी को दोषी ठहराते हुए भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 के तहत एक साल की सजा और जुर्माना लगाया था।
इसके अलावा धारा 13(2) के तहत दो साल की कठोर कैद और जुर्माना भी लगाया गया।
बाद में आरोपी ने हाईकोर्ट में अपील दायर की, लेकिन 2012 में हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।
सुप्रीम कोर्ट ने दोनों अदालतों के फैसलों की समीक्षा करते हुए कहा कि अभियोजन के प्रमुख गवाहों की गवाही विश्वसनीय है और रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्य दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त हैं।
पीठ ने कहा:
“PW-1 और PW-2 की गवाही का अवलोकन करने पर हमें कोई ऐसा विरोधाभास नहीं मिला जिससे उनके बयान पर संदेह किया जा सके।”
अदालत ने यह भी कहा कि केवल यह तथ्य कि स्वतंत्र गवाह शिकायतकर्ता को जानता था, उसे “रुचि रखने वाला गवाह” नहीं बना देता।
पीठ ने कहा:
“केवल परिचय के आधार पर किसी गवाह को पक्षपाती नहीं माना जा सकता, इसके लिए ठोस सामग्री दिखानी होती है।”
आरोपी की ओर से यह तर्क दिया गया कि शिकायतकर्ता ने निजी दुश्मनी के कारण झूठा मामला बनाया है।
हालांकि, अदालत ने पाया कि शिकायतकर्ता ने विस्तृत रूप से ट्रैप की पूरी प्रक्रिया और रिश्वत मांगने की घटना का विवरण दिया था और उसकी गवाही अन्य गवाहों से भी पुष्ट होती है।
अदालत ने यह भी कहा कि नोटों को अदालत में पेश नहीं किए जाने का तर्क इस चरण पर स्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह मुद्दा पहले की अदालतों में उठाया ही नहीं गया था।
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने दोषसिद्धि को बरकरार रखा, लेकिन आरोपी की उम्र और मामले की परिस्थितियों को देखते हुए सजा में कुछ कमी की।
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अदालत ने कहा कि अपराध के समय आरोपी लगभग 40 वर्ष का था और अब उसकी उम्र करीब 75 वर्ष है।
इन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए अदालत ने सजा को संशोधित करते हुए:
- धारा 7 के तहत 6 महीने की कठोर कैद
- धारा 13(2) के तहत 1 वर्ष की कठोर कैद
निर्धारित की।
इसी के साथ अदालत ने अपील का निपटारा कर दिया।
Case Title: Raj Bahadur Singh v. State of Uttarakhand
Case No.: Criminal Appeal No. 1105 of 2013
Decision Date: 13 March 2026










