कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक सड़क दुर्घटना में दो बेटों को खो चुके माता-पिता को अतिरिक्त मुआवज़ा देने का आदेश दिया है। अदालत ने पाया कि ट्रायल कोर्ट द्वारा तय की गई राशि कुछ हद तक कम थी, इसलिए आंशिक संशोधन करते हुए मुआवज़े में बढ़ोतरी की गई।
न्यायमूर्ति बिस्वरूप चौधरी की एकल पीठ ने दोनों अपीलों पर संयुक्त रूप से सुनवाई करते हुए फैसला सुनाया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 30 दिसंबर 2015 को हुई एक सड़क दुर्घटना से जुड़ा है। हादसे में सौरव सेन मजूमदार और सौविक सेन मजूमदार नामक दो युवकों की मृत्यु हो गई थी।
पीड़ितों के माता-पिता, संचित्ता सेन मजूमदार और अशोक सेन मजूमदार ने मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण के समक्ष मुआवज़े की मांग करते हुए दावा याचिकाएं दायर की थीं। इन याचिकाओं में आरोप लगाया गया कि गैस टैंकर वाहन की लापरवाही और तेज़ रफ्तार ड्राइविंग के कारण यह दुर्घटना हुई।
मामले की सुनवाई पहले हुगली के जिला न्यायाधीश के समक्ष हुई और बाद में इसे अतिरिक्त जिला न्यायाधीश, चंदननगर (चिनसुरा) की अदालत में स्थानांतरित किया गया।
ट्रायल कोर्ट ने दोनों मामलों में अलग-अलग आदेश पारित किए थे।
पहले मामले में अदालत ने लगभग ₹8,26,000 मुआवज़ा और 8% वार्षिक ब्याज देने का निर्देश दिया था। दूसरे मामले में लगभग ₹9,77,200 मुआवज़ा और समान ब्याज दर तय की गई थी।
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दोनों मामलों में भुगतान का दायित्व वाहन की बीमा कंपनी ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड पर डाला गया था।
हालांकि, पीड़ितों के माता-पिता ने उच्च न्यायालय में अपील दाखिल कर कहा कि यह मुआवज़ा वास्तविक नुकसान के मुकाबले कम है।
अपीलकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि एक मृतक इंजीनियरिंग का छात्र था और उसका भविष्य उज्ज्वल था। इसलिए उसकी संभावित आय को बहुत कम आंका गया।
दूसरे मामले में भी यह कहा गया कि मृतक छात्र की आय केवल छात्र जीवन की कमाई के आधार पर तय नहीं की जानी चाहिए, बल्कि उसके भविष्य की संभावनाओं को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
अदालत ने दोनों मामलों की परिस्थितियों का अलग-अलग विश्लेषण किया।
पहले मामले में अदालत ने कहा कि ट्रायल कोर्ट द्वारा मासिक आय ₹6,000 मानना उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर उचित है और इसमें हस्तक्षेप की जरूरत नहीं है।
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हालांकि अदालत ने यह भी पाया कि माता-पिता को मिलने वाला “कंसोर्टियम” (परिवारिक संबंध के नुकसान का मुआवज़ा) पर्याप्त नहीं दिया गया था।
न्यायालय ने कहा, “इस मामले में कंसोर्टियम की राशि केवल एक अभिभावक को दी गई थी, जबकि परिस्थितियों को देखते हुए अतिरिक्त राशि दी जानी चाहिए।”
इस आधार पर अदालत ने अतिरिक्त ₹50,000 मुआवज़ा देने का आदेश दिया।
दूसरे मृतक के मामले में अदालत ने पाया कि वह कक्षा 10 का छात्र था और मार्च 2016 में होने वाली सीबीएसई परीक्षा में शामिल होने वाला था।
अदालत ने कहा कि ऐसे छात्र को केवल बेरोजगार मानकर उसकी आय तय करना उचित नहीं होगा।
पीठ ने टिप्पणी की, “एक छात्र, जो स्कूल फाइनल परीक्षा देने वाला हो, भविष्य में नौकरी, व्यवसाय या किसी पेशे में आगे बढ़ सकता है। इसलिए उसकी संभावित आय को ध्यान में रखना आवश्यक है।”
इस आधार पर अदालत ने छात्र की काल्पनिक मासिक आय ₹8,000 मानते हुए मुआवज़े की पुनर्गणना की।
गणना के बाद कुल मुआवज़ा ₹13,00,000 निर्धारित किया गया।
अदालत ने आदेश दिया कि पहले से दिए गए ₹8,26,000 को घटाकर शेष ₹4,74,000 अतिरिक्त मुआवज़ा पीड़ितों को दिया जाए।
दूसरे मामले में भी अदालत ने ट्रायल कोर्ट के निर्णय में संशोधन करते हुए ₹50,000 अतिरिक्त मुआवज़ा देने का निर्देश दिया।
न्यायालय ने यह भी कहा कि बीमा कंपनी को यह राशि 6% वार्षिक ब्याज के साथ जमा करनी होगी और भुगतान आदेश की सूचना मिलने के आठ सप्ताह के भीतर किया जाएगा।
दोनों अपीलें इसी निर्देश के साथ निपटा दी गईं।
Case Title: Sanchita Sen Majumdar & Anr. vs Oriental Insurance Co. Ltd. & Ors.
Case No.: FMAT (MV) 38 of 2023 with FMA 188 of 2024
Decision Date: 12 March 2026










