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तीन साल के अभ्यास नियम पर चल रही बहस के बीच सुप्रीम कोर्ट ने सिविल जज के आवेदन की समय सीमा बढ़ा दी है।

भूमिका ट्रस्ट बनाम भारत संघ और संबंधित मामले - सर्वोच्च न्यायालय ने सिविल न्यायाधीशों के लिए 3 साल के अभ्यास नियम पर बहस की, समीक्षा सुनवाई के दौरान न्यायिक सेवा आवेदन की समय सीमा 30 अप्रैल, 2026 तक बढ़ा दी।

Shivam Y.
तीन साल के अभ्यास नियम पर चल रही बहस के बीच सुप्रीम कोर्ट ने सिविल जज के आवेदन की समय सीमा बढ़ा दी है।

सर्वोच्च न्यायालय में शुक्रवार 13 मार्च को सिविल जज (जूनियर डिवीजन) भर्ती के लिए अनिवार्य तीन साल की वकालत प्रैक्टिस के नियम पर सुनवाई के दौरान न्यायाधीशों के बीच अलग-अलग राय सामने आई।

कुछ न्यायाधीशों ने कहा कि अदालत में व्यावहारिक अनुभव जरूरी है ताकि उम्मीदवारों को न्यायिक कामकाज की समझ हो सके। वहीं, कुछ ने चिंता जताई कि इस नियम के कारण प्रतिभाशाली युवा कानून स्नातक न्यायपालिका में आने से दूर हो सकते हैं।

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि जिन राज्यों और हाईकोर्टों में सिविल जज भर्ती की प्रक्रिया चल रही है, वहां आवेदन की अंतिम तारीख 30 अप्रैल 2026 तक बढ़ाई जाए ताकि किसी भी उम्मीदवार के साथ अन्याय न हो।

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मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद सुप्रीम कोर्ट के 20 मई 2025 के फैसले से जुड़ा है, जो All India Judges Association v. Union of India मामले में दिया गया था।

इस फैसले में कोर्ट ने फिर से यह नियम लागू किया कि सिविल जज (जूनियर डिवीजन) बनने के लिए उम्मीदवार के पास कम से कम तीन साल की वकालत का अनुभव होना चाहिए।

यह शर्त 2002 में हटा दी गई थी, जिससे नए कानून स्नातकों को सीधे न्यायिक सेवा परीक्षा देने की अनुमति मिल गई थी। अब इस नियम की वापसी के खिलाफ कई याचिकाएं दाखिल की गई हैं।

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सुनवाई कर रही पीठ में जस्टिस सूर्यकांत, के. विनोद चंद्रन और ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह शामिल थे।

जस्टिस चंद्रन ने इस नियम का समर्थन करते हुए कहा कि कोचिंग संस्थानों का प्रभाव बढ़ रहा है और अदालत का अनुभव जरूरी है उन्होंने कहा,

“पूरी समस्या कोचिंग सेंटरों से जुड़ी है। हमने जजों के इंटरव्यू लिए हैं और सिस्टम को करीब से देखा है।”

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वहीं, मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि इस नियम से प्रतिभाशाली छात्र निजी क्षेत्र में चले जा सकते हैं। उन्होंने कहा,

“अगर आज आप योग्य लोगों को नहीं चुनेंगे, तो आने वाले 20-40 वर्षों के लिए न्यायपालिका में किस तरह के लोग होंगे, यह कहना मुश्किल है।”

उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि केवल तीन साल अदालत में बैठना क्या वास्तव में न्यायिक क्षमता बढ़ाने के लिए पर्याप्त है।

सुनवाई के दौरान एमिकस क्यूरी सिद्धार्थ भटनागर ने नियम को लागू करने के लिए कई सुझाव दिए।

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इनमें तीन साल की शर्त को बरकरार रखना, चरणबद्ध तरीके से लागू करना या महिलाओं और दिव्यांग उम्मीदवारों को सीमित छूट देने जैसे विकल्प शामिल थे।

हालांकि, मुख्य न्यायाधीश ने संकेत दिया कि विशेष श्रेणियों को अलग छूट देना व्यावहारिक नहीं हो सकता।

सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि सिविल जज (जूनियर डिवीजन) पदों के लिए जारी सभी भर्तियों में आवेदन की अंतिम तारीख 30 अप्रैल 2026 तक बढ़ाई जाए।

कोर्ट ने फिलहाल तीन साल की प्रैक्टिस की शर्त को स्थगित करने से इनकार कर दिया और कहा कि मामले की आगे सुनवाई अगले सप्ताह की जाएगी।

Case Title:– Bhumika Trust v. Union of India and connected cases

Case no.:– W.P.(C) No. 001110 / 2025 and connected cases

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