कोविड-19 महामारी के दौरान देशभर में बड़े पैमाने पर चलाए गए टीकाकरण अभियान से जुड़े गंभीर दुष्प्रभावों के मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला दिया है। अदालत ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि कोविड वैक्सीन के बाद गंभीर प्रतिकूल घटनाओं (Adverse Events Following Immunisation – AEFI) से प्रभावित लोगों के लिए नो-फॉल्ट मुआवजा नीति तैयार की जाए।
अदालत ने स्पष्ट किया कि यह निर्देश सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रम के दौरान हुए संभावित नुकसान के मामलों में पीड़ित परिवारों को एक व्यवस्थित राहत तंत्र उपलब्ध कराने के उद्देश्य से दिया गया है।
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मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला Rachana Gangu & Anr. बनाम Union of India नामक याचिका से शुरू हुआ था। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि कोविड वैक्सीन लेने के बाद उनकी दोनों बेटियों की मृत्यु हो गई। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से मांग की थी कि ऐसे मामलों की जांच के लिए स्वतंत्र मेडिकल बोर्ड गठित किया जाए और पीड़ित परिवारों को मुआवजा दिया जाए।
बाद में इसी तरह के कई मामले केरल हाईकोर्ट में भी दाखिल हुए, जिनमें दावा किया गया कि टीकाकरण के बाद मौत या गंभीर बीमारी हुई और परिवारों को मुआवजा मिलना चाहिए। इन मामलों में केरल हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार को ऐसी नीति बनाने पर विचार करने का निर्देश दिया था।
इस आदेश को चुनौती देते हुए केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची, जिसके बाद सभी संबंधित मामलों को एक साथ सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया।
याचिकाकर्ताओं के तर्क
याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि कोविड टीकाकरण कार्यक्रम के दौरान पारदर्शिता और सूचित सहमति (informed consent) का अभाव रहा।
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उन्होंने अदालत को बताया कि:
- सरकार ने वैक्सीन से जुड़े संभावित जोखिमों के बारे में पर्याप्त जानकारी सार्वजनिक नहीं की।
- कुछ देशों ने एस्ट्राजेनेका आधारित वैक्सीन के उपयोग को सीमित किया था, लेकिन भारत में ऐसी जानकारी व्यापक रूप से साझा नहीं की गई।
- कई परिवारों ने वैक्सीन के बाद गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं या मौतें देखीं, लेकिन उन्हें राहत पाने के लिए कोई स्पष्ट नीति उपलब्ध नहीं थी।
याचिकाकर्ताओं ने कहा कि यह स्थिति संविधान के अनुच्छेद 14, 19(1)(a) और 21 के तहत नागरिकों के अधिकारों का उल्लंघन है।
केंद्र सरकार का पक्ष
केंद्र सरकार ने अदालत में कहा कि कोविड वैक्सीन को नियामक प्रक्रियाओं के तहत विशेषज्ञ संस्थाओं द्वारा मंजूरी दी गई थी।
सरकार ने बताया कि:
- वैक्सीन को CDSCO और अन्य वैज्ञानिक समितियों की समीक्षा के बाद मंजूरी दी गई।
- देश में AEFI की निगरानी के लिए राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर विशेषज्ञ समितियां काम कर रही हैं।
- गंभीर प्रतिकूल घटनाओं की रिपोर्टिंग और जांच की व्यवस्थित प्रक्रिया पहले से मौजूद है।
सरकार ने यह भी तर्क दिया कि मुआवजे के दावे के लिए प्रभावित लोग उपभोक्ता अदालत या अन्य कानूनी मंचों का सहारा ले सकते हैं।
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सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ की पीठ ने कहा कि महामारी के दौरान सरकार ने बड़े पैमाने पर टीकाकरण कार्यक्रम चलाया, जिसने सार्वजनिक स्वास्थ्य की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
हालांकि अदालत ने यह भी कहा कि अगर किसी राष्ट्रीय सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रम के दौरान गंभीर नुकसान की शिकायत सामने आती है, तो प्रभावित परिवारों को राहत पाने का कोई स्पष्ट और सुलभ तंत्र होना चाहिए।
पीठ ने कहा:
“संविधान राज्य को केवल दर्शक की भूमिका नहीं देता, बल्कि उसे नागरिकों के स्वास्थ्य और गरिमा की रक्षा करने वाला सक्रिय संरक्षक मानता है।”
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि हर बीमारी या मृत्यु को सीधे वैक्सीन से जोड़ना वैज्ञानिक जांच का विषय है और यह अदालत के दायरे में नहीं आता।
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अदालत का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने मामले का निपटारा करते हुए केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि:
- स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय कोविड-19 टीकाकरण के बाद गंभीर प्रतिकूल घटनाओं के मामलों के लिए नो-फॉल्ट मुआवजा नीति तैयार करे।
- AEFI की निगरानी और रिपोर्टिंग की मौजूदा प्रणाली जारी रहे और उससे संबंधित डेटा समय-समय पर सार्वजनिक किया जाए।
- अदालत ने किसी नए स्वतंत्र विशेषज्ञ पैनल के गठन की मांग को स्वीकार नहीं किया और कहा कि मौजूदा तंत्र पर्याप्त है।
- यह भी स्पष्ट किया गया कि यह नीति बनाना सरकार की जिम्मेदारी है और इससे सरकार की किसी प्रकार की कानूनी जिम्मेदारी स्वीकार करने का अर्थ नहीं निकाला जाएगा।
इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने सभी संबंधित याचिकाओं का निस्तारण कर दिया।
Case Title: Rachana Gangu & Anr. v. Union of India & Ors.
Case No.: W.P.(C) No. 1220 of 2021 (with connected matters)
Decision Date: 10 March 2026










