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सुप्रीम कोर्ट ने गवाह संरक्षण योजना को ज़मानत रद्द करने के विकल्प के रूप में मानने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट को फटकार लगाई, नए सिरे से सुनवाई का आदेश दिया

फिरेराम बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य - सुप्रीम कोर्ट ने गवाह संरक्षण योजना को जमानत रद्द करने के विकल्प के रूप में मानने पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय की आलोचना की, हत्या के मामले में नए सिरे से सुनवाई का आदेश दिया।

Shivam Y.
सुप्रीम कोर्ट ने गवाह संरक्षण योजना को ज़मानत रद्द करने के विकल्प के रूप में मानने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट को फटकार लगाई, नए सिरे से सुनवाई का आदेश दिया

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को इलाहाबाद हाईकोर्ट को कड़ी फटकार लगाई और कहा कि वह लगातार ऐसे "टेम्पलेट आदेश" पास कर रहा है जिनमें जमानत रद्द करने की याचिकाओं को गवाह संरक्षण योजना, 2018 की ओर मोड़ दिया जाता है। जस्टिस जे.बी. पारडीवाला और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने कहा कि यह तरीका क़ानूनी रूप से गलत है और हाईकोर्ट का कर्तव्य है कि वह जमानत उल्लंघन के मामलों का गुण-दोष के आधार पर फैसला करे।

पृष्ठभूमि

मामला 2022 के गौतम बुध नगर, उत्तर प्रदेश के एक हत्या मामले से जुड़ा है। आरोपी को अप्रैल 2024 में जमानत दी गई थी। जमानत आदेश में सख्त शर्तें थीं - गवाहों को धमकी नहीं देना, सबूतों से छेड़छाड़ नहीं करना और अदालत में पेश होना। लेकिन शिकायतकर्ता फिरेराम का आरोप है कि आरोपी ने जल्द ही गवाहों को धमकाना शुरू कर दिया। गवाह चाहत राम ने धमकी मिलने का आरोप लगाते हुए दो नई एफआईआर भी दर्ज कराई।

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फिरेराम ने जब जमानत रद्द करने के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया तो कोर्ट ने हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया और शिकायतकर्ता को गवाह संरक्षण योजना का सहारा लेने की सलाह दी। 11 अप्रैल 2025 का वही आदेश अब सुप्रीम कोर्ट ने पलट दिया है।

अदालत की टिप्पणियाँ

सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर चिंता जताई कि हाईकोर्ट ने पिछले एक साल में कम से कम 40 ऐसे ही कॉपी-पेस्ट आदेश दिए हैं।

पीठ ने कहा,

"हमें यह देखकर निराशा हुई कि पिछले दो साल से ऐसे साइक्लोस्टाइल्ड टेम्पलेट आदेश पारित किए जा रहे हैं।"

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जजों ने स्पष्ट किया कि जमानत रद्द करना और गवाह संरक्षण “अलग-अलग उपाय” हैं। योजना गवाहों को धमकी से बचाती है लेकिन जब जमानत की शर्तें तोड़ी जाती हैं तो न्यायिक जांच का विकल्प नहीं हो सकती।

पीठ ने कहा,

"जब यह साफ़ तौर पर जमानत शर्तों के उल्लंघन का मामला है… तब गवाह संरक्षण योजना की कोई भूमिका नहीं रहती।"

पीठ ने यह भी बताया कि सरकारी वकील, जज को सही दिशा दिखाने के बजाय खुद शिकायतकर्ताओं को योजना का सहारा लेने के लिए कह रहे थे। आदेश में साफ़ कहा गया, "हम इस प्रथा की निंदा करते हैं।"

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निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का आदेश रद्द करते हुए मामले को दोबारा सुनवाई के लिए भेज दिया। हाईकोर्ट को निर्देश दिया गया है कि वह गवाह चाहत राम द्वारा दर्ज एफआईआर पर जांच अधिकारी की रिपोर्ट मंगवाए, सभी पक्षों को सुनवाई का अवसर दे और चार हफ़्तों के भीतर एक ठोस आदेश पारित करे।

सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री को यह आदेश देश की सभी हाईकोर्ट्स में भेजने और इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को विशेष प्रति भेजने का भी निर्देश दिया गया।

इसके साथ ही अपील का निस्तारण कर दिया गया और सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ कहा - जमानत की शर्तों को गवाह संरक्षण के नाम पर नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

केस का शीर्षक: फिरेराम बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य

केस संख्या: आपराधिक अपील संख्या 3830/2025

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