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पत्नी की गवाही विश्वसनीय: इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने हत्या के प्रयास के आरोप में पति की सजा बरकरार रखा

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पत्नी पर गोली चलाने के 1983 के मामले में आरोपी की 7 साल की सजा बरकरार रखते हुए अपील खारिज कर दी। -

Shivam Y.
पत्नी की गवाही विश्वसनीय: इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने हत्या के प्रयास के आरोप में पति की सजा बरकरार रखा

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में पत्नी पर गोली चलाने के मामले में दोषी ठहराए गए आरोपी की सजा को बरकरार रखते हुए उसकी आपराधिक अपील खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष ने अपना मामला संदेह से परे साबित किया है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला वर्ष 1983 का है, जब शुरू में आरोपी ने खुद एफआईआर दर्ज कराते हुए दावा किया था कि कुछ अज्ञात बदमाश घर में घुस आए और उसकी पत्नी को गोली मारकर फरार हो गए।

जांच के दौरान मामला पलट गया। घायल पत्नी ने बयान दिया कि गोली उसी के पति ने चलाई थी। इसके बाद पुलिस ने धारा 307 आईपीसी (हत्या का प्रयास) के तहत आरोप तय करते हुए चार्जशीट दाखिल की।

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ट्रायल कोर्ट ने 1985 में आरोपी को दोषी ठहराते हुए 7 साल की सजा सुनाई थी, जिसके खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर की गई।

हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान खास तौर पर घायल पत्नी की गवाही को अहम माना।

अदालत ने कहा,

“घायल गवाह की गवाही अत्यंत महत्वपूर्ण होती है और उसकी उपस्थिति घटना स्थल पर स्वाभाविक रूप से साबित होती है।”

कोर्ट ने यह भी कहा कि

“गवाहों की संख्या नहीं, बल्कि उनकी गवाही की गुणवत्ता मायने रखती है।”

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पहचान को लेकर उठाए गए सवालों पर अदालत ने स्पष्ट किया कि घटना घर के अंदर हुई थी और आरोपी पति ही था, इसलिए “गलत पहचान की कोई संभावना नहीं है।”

अदालत ने पाया कि:

  • घायल पत्नी का बयान लगातार और विश्वसनीय है
  • मेडिकल रिपोर्ट में गोली लगने की पुष्टि हुई
  • पति-पत्नी के बीच संबंध सामान्य नहीं थे

कोर्ट ने यह भी माना कि बचाव पक्ष की “अज्ञात बदमाश” वाली कहानी भरोसेमंद नहीं लगती, क्योंकि उसे ठोस साक्ष्यों से साबित नहीं किया गया।

सभी तथ्यों और साक्ष्यों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही ठहराया।

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अदालत ने कहा,

“अभियोजन ने अपना मामला संदेह से परे सिद्ध कर दिया है।”

इसके साथ ही अदालत ने अपील खारिज कर दी और आरोपी को 15 दिनों के भीतर निचली अदालत में आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि आरोपी निर्धारित समय में सरेंडर नहीं करता है, तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई करते हुए उसे गिरफ्तार कर सजा पूरी कराई जाएगी।

Case Title: Rameshwar Dayal vs State

Case Number: Criminal Appeal No. 501 of 1985

Judge: Hon’ble Justice Abdul Shahid

Decision Date: 19 March 2026

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