सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को दिव्यांगों के अधिकारों को लेकर एक अहम फैसला सुनाया। कोल इंडिया लिमिटेड में मैनेजमेंट ट्रेनी पद से वंचित रहीं सुजाता बोरा के मामले में अदालत ने साफ कहा कि केवल तकनीकी वजहों से किसी योग्य दिव्यांग उम्मीदवार को नौकरी से दूर नहीं रखा जा सकता।
मामले की पृष्ठभूमि
साल 2019 में कोल इंडिया लिमिटेड ने मैनेजमेंट ट्रेनी की भर्ती निकाली थी। सुजाता बोरा ने दृष्टिबाधित श्रेणी के तहत आवेदन किया और इंटरव्यू तक पहुंचीं। लेकिन 2021 में मेडिकल जांच के बाद उन्हें “अयोग्य” बताकर बाहर कर दिया गया। कारण बताया गया कि उन्हें सिर्फ दृष्टि संबंधी समस्या नहीं, बल्कि आंशिक पक्षाघात भी है।
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इसके बाद सुजाता बोरा ने कोलकाता हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। वहां सिंगल जज ने माना कि सार्वजनिक उपक्रम होने के नाते कोल इंडिया को दिव्यांगों के लिए भर्ती नियमों में जरूरी बदलाव करने चाहिए थे। हालांकि, डिवीजन बेंच ने बाद में यह फैसला पलट दिया, यह कहते हुए कि भर्ती पैनल की अवधि खत्म हो चुकी थी।
सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ
मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो अदालत ने AIIMS से मेडिकल बोर्ड बनवाकर दोबारा जांच करवाई। रिपोर्ट में साफ हुआ कि सुजाता बोरा की 57% दिव्यांगता है, जो कानून में तय “बेंचमार्क डिसेबिलिटी” से ज्यादा है।
सुनवाई के दौरान जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने कहा,
“शारीरिक दृष्टि का अभाव, जीवन की दृष्टि का अभाव नहीं होता।”
अदालत ने माना कि सुजाता बोरा को 2019 में ही गलत तरीके से नौकरी से रोका गया था।
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कोर्ट की अहम टिप्पणियां
पीठ ने “उचित सुविधा” (Reasonable Accommodation) के सिद्धांत पर खास जोर दिया। अदालत ने कहा कि दिव्यांगों को बराबरी का मौका देने के लिए संस्थानों को अपने नियमों में लचीलापन दिखाना होगा।
कोर्ट ने टिप्पणी की,
“उचित सुविधा कोई दया नहीं, बल्कि अधिकार है। इसके बिना दिव्यांग व्यक्ति मुख्यधारा से बाहर हो जाता है।”
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि जब दिव्यांगता के साथ लैंगिक असमानता जुड़ जाती है, तो मामला और संवेदनशील हो जाता है। सुजाता बोरा एक अकेली महिला हैं, जिन्होंने तमाम मुश्किलों के बावजूद आगे बढ़ने का साहस दिखाया।
कोल इंडिया की भूमिका पर सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों पर सामाजिक जिम्मेदारी ज्यादा होती है। केवल नियमों की आड़ लेकर किसी योग्य उम्मीदवार को बाहर करना कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी के खिलाफ है।
पीठ ने साफ शब्दों में कहा,
“दिव्यांगों के अधिकार मानवाधिकार हैं। कंपनियों को इसे सिर्फ नीति का मामला नहीं, बल्कि संवैधानिक जिम्मेदारी समझना चाहिए।”
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अदालत का फैसला
सभी पहलुओं पर विचार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कोलकाता हाईकोर्ट के डिवीजन बेंच का आदेश रद्द कर दिया। अदालत ने निर्देश दिया कि:
- कोल इंडिया सुजाता बोरा के लिए सुपरन्यूमेरेरी पोस्ट (अतिरिक्त पद) बनाए।
- उन्हें उनकी क्षमता के अनुरूप डेस्क जॉब दी जाए।
- असम के मार्घेरिटा स्थित नॉर्थ ईस्टर्न कोलफील्ड्स कार्यालय में तैनाती पर विचार किया जाए।
- यह आदेश संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत विशेष परिस्थितियों में दिया गया है।
इसके साथ ही अदालत ने कोल इंडिया के वकील और AIIMS के डॉक्टरों की भूमिका की भी सराहना की, जिनके सहयोग से मामला सकारात्मक अंत तक पहुंचा।
Case Title: Sujata Bora vs Coal India Limited & Ors.
Case No.: Civil Appeal No. 120 of 2026
Case Type: Service Matter / Disability Rights
Decision Date: 13 January 2026









