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15 साल पुराने रिकॉर्ड पर रिटायरमेंट गलत, हाईकोर्ट ने दिलाया 4 साल का पूरा वेतन

के सी जैन बनाम राजस्थान राज्य एवं अन्य। राजस्थान हाईकोर्ट ने अनिवार्य सेवानिवृत्ति रद्द होने के बाद 4 साल का वेतन देने का आदेश दिया, नो वर्क नो पे सिद्धांत लागू नहीं माना।

Vivek G.
15 साल पुराने रिकॉर्ड पर रिटायरमेंट गलत, हाईकोर्ट ने दिलाया 4 साल का पूरा वेतन

जयपुर बेंच में सोमवार को एक पुराना सेवा विवाद फिर से चर्चा में रहा। अदालत कक्ष में सन्नाटा था जब न्यायमूर्ति ने साफ शब्दों में कहा कि यदि किसी कर्मचारी की अनिवार्य सेवानिवृत्ति (compulsory retirement) गलत पाई जाती है, तो उसे वेतन से वंचित नहीं किया जा सकता।

मामला के.सी. जैन का था, जिन्हें 2006 में जबरन रिटायर कर दिया गया था। बाद में विभागीय अपील में वह आदेश रद्द हो गया, लेकिन चार साल की तनख्वाह रोक दी गई। इसी हिस्से को चुनौती देते हुए वे हाईकोर्ट पहुँचे।

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मामले की पृष्ठभूमि

रिकॉर्ड के अनुसार, 14 जून 2006 को के.सी. जैन को अनिवार्य सेवानिवृत्ति का आदेश दिया गया था । उन्होंने इस आदेश को विभागीय अपीलीय प्राधिकारी के सामने चुनौती दी।

18 अगस्त 2014 को अपीलीय प्राधिकारी ने सेवानिवृत्ति का आदेश रद्द कर दिया। आदेश में कहा गया कि पिछले पाँच वर्षों में उनके सेवा रिकॉर्ड में ऐसा कोई प्रतिकूल (adverse) सामग्री नहीं थी, जिससे उन्हें “डेड वुड” यानी अनुपयोगी कर्मचारी माना जाए ।

यह भी दर्ज किया गया कि जिन प्रतिकूल टिप्पणियों का हवाला दिया गया, वे 1985-86 और 1990-91 की थीं, और उन्हें कभी औपचारिक रूप से कर्मचारी को बताया भी नहीं गया था ।

हालाँकि अपील स्वीकार करते हुए सेवानिवृत्ति रद्द कर दी गई, लेकिन 14 जून 2006 से 31 जुलाई 2010 तक की अवधि का वेतन यह कहते हुए नहीं दिया गया कि उस दौरान उन्होंने कोई काम नहीं किया था ।

अदालत में क्या दलीलें दी गईं

याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि जब सेवानिवृत्ति का आदेश ही अवैध पाया गया, तो वेतन रोकने का कोई आधार नहीं बचता। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसले शोभा राम रतूरी बनाम हरियाणा विद्युत प्रसारण निगम लिमिटेड का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि यदि कर्मचारी को सेवा से दूर रखा गया हो, तो “नो वर्क नो पे” का सिद्धांत लागू नहीं होगा।

वकील ने कहा, “जब गलती विभाग की हो और कर्मचारी को काम करने से रोका गया हो, तो वेतन से वंचित करना अन्याय होगा।”

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दूसरी ओर, राज्य की ओर से पेश अधिवक्ता ने दलील दी कि संबंधित अवधि में कर्मचारी ने कोई ड्यूटी नहीं की थी। इसलिए वेतन न देना उचित था। उन्होंने आग्रह किया कि याचिका में कोई दम नहीं है और इसे खारिज किया जाना चाहिए ।

कोर्ट की टिप्पणियाँ

न्यायमूर्ति ने रिकॉर्ड देखते हुए कहा कि अपीलीय प्राधिकारी ने साफ तौर पर पाया था कि पिछले पाँच वर्षों में सेवा रिकॉर्ड में कोई गंभीर कमी नहीं थी ।

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लेख करते हुए कहा, “यदि कर्मचारी को सेवा से बाहर रखने में विभाग की भूमिका हो, तो बाद में यह नहीं कहा जा सकता कि उसने काम नहीं किया, इसलिए वेतन नहीं मिलेगा।”

न्यायालय ने माना कि यहाँ भी वही स्थिति है। जब अनिवार्य सेवानिवृत्ति को आधारहीन पाया गया, तो वेतन रोकना तर्कसंगत नहीं ठहराया जा सकता।

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अंतिम निर्णय

अदालत ने स्पष्ट किया कि 14 जून 2006 से 31 जुलाई 2010 तक की अवधि का पूरा वेतन और अन्य भत्ते याचिकाकर्ता को दिए जाने चाहिए ।

कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि तीन महीने के भीतर यह भुगतान किया जाए ।

इसी निर्देश के साथ याचिका का निपटारा कर दिया गया।

Case Title: K C Jain v. State of Rajasthan & Ors.

Case No.: S.B. Civil Writ Petition No. 5502/2007

Decision Date: 09/02/2026

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