इलाहाबाद उच्च न्यायालय में गुरुवार को एक युवा दंपत्ति की सुरक्षा को लेकर सुनवाई हुई। अदालत में दोनों पक्षों की दलीलें सुनी गईं। मामला एक ऐसे विवाह का था, जिसे परिवार की सहमति नहीं मिली। दंपत्ति ने अदालत से अपनी जान और स्वतंत्रता की सुरक्षा की गुहार लगाई थी।
न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार द्वारा जारी दिशा-निर्देश सभी अधिकारियों पर बाध्यकारी हैं और उनका पालन किया जाना चाहिए।
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मामला क्या था?
याचिकाकर्ता-एक 20 वर्षीय युवती और 33 वर्षीय युवक-दोनों मुस्लिम और बालिग हैं। उन्होंने अपनी मर्जी से विवाह किया।
अदालत में उनके वकील ने बताया कि लड़की के पिता इस शादी से नाराज़ हैं। उम्र के अंतर और यह संदेह कि यह युवक की दूसरी शादी है, इन कारणों से परिवार लगातार विरोध कर रहा है। याचिका में कहा गया कि उन्हें धमकियाँ दी जा रही हैं और शांतिपूर्ण वैवाहिक जीवन में दखल दिया जा रहा है।
राज्य की ओर से पेश स्थायी अधिवक्ता ने निर्देश लेकर अदालत को बताया कि यह दोनों की पहली शादी है।
अदालत की टिप्पणी: “युवा जोड़ों की सुरक्षा के लिए व्यवस्था पहले से मौजूद है”
सुनवाई के दौरान न्यायालय ने कहा कि हाल के वर्षों में बड़ी संख्या में युवा जोड़े सुरक्षा की मांग लेकर अदालत आ रहे हैं।
पीठ ने पूर्व के एक फैसले और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का हवाला देते हुए कहा कि सरकार पहले ही 31 अगस्त 2019 को एक शासनादेश जारी कर चुकी है। यह शासनादेश ऐसे मामलों में पुलिस और जिला प्रशासन को स्पष्ट जिम्मेदारी देता है।
अदालत ने दो टूक कहा, “शासनादेश में दिए गए निर्देश सभी संबंधित अधिकारियों पर बाध्यकारी हैं और उनका सख्ती से पालन किया जाना चाहिए।”
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इस आदेश के अनुसार, यदि किसी जोड़े को परिवार या समुदाय से खतरा हो तो पुलिस को खतरे का आकलन करना होगा। जरूरत पड़ने पर सुरक्षित आवास (सेफ हाउस) उपलब्ध कराना भी प्रशासन की जिम्मेदारी है।
अदालत ने याद दिलाया कि अंतरजातीय या अंतरधार्मिक विवाह ही नहीं, बल्कि पारिवारिक विरोध के मामलों में भी प्रशासन को संवेदनशीलता के साथ कदम उठाना चाहिए।
अंतरिम संरक्षण के बाद क्या स्थिति रही?
याचिकाकर्ताओं के वकील ने अदालत को बताया कि 26 नवंबर 2025 को दिए गए अंतरिम संरक्षण के बाद अब फिलहाल कोई तात्कालिक खतरा नहीं है। लड़की के पिता की ओर से आगे कोई सीधी धमकी नहीं मिली है।
इस पर अदालत ने कहा कि यदि भविष्य में वास्तविक और गंभीर खतरा उत्पन्न होता है, तो दंपत्ति सीधे पुलिस अधिकारियों से संपर्क कर सकते हैं।
पीठ ने स्पष्ट निर्देश दिया कि पुलिस ऐसी शिकायत मिलने पर खतरे का आकलन करे और शासनादेश के अनुसार उचित सुरक्षा दे।
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निर्णय
सभी तथ्यों को देखते हुए अदालत ने याचिका का निस्तारण कर दिया।
हालांकि, आदेश में यह भी साफ किया गया कि अदालत ने विवाह की वैधता पर कोई निर्णय नहीं दिया है।
पीठ ने कहा, “यह आदेश विवाह की वैधता पर निर्णय नहीं माना जाएगा। अदालत ने न तो किसी आपराधिक आरोप की जांच की है और न ही उस पर कोई राय व्यक्त की है।”
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी प्रकार का आपराधिक आरोप है, तो संबंधित अधिकारी कानून के अनुसार कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र रहेंगे।
Case Title: Smt. Samiya and Another vs State of U.P. and 3 Others
Case No.: Writ - C No. 41804 of 2025
Decision Date: 03 February 2026









