इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने यौन अपराधों से पीड़ित बच्चों के अधिकारों को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ कहा कि केवल मेडिकल रिपोर्ट में चोट न होने के आधार पर POCSO पीड़िता को मुआवजे से वंचित नहीं किया जा सकता।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला गोंडा जिले से जुड़ा है, जहां मार्च 2025 में एक नाबालिग बच्ची के साथ यौन उत्पीड़न की घटना दर्ज हुई थी। FIR दर्ज होने और बाद में चार्जशीट दाखिल होने के बावजूद, जिला संचालन समिति ने यह कहते हुए मुआवजा रोक दिया कि मेडिकल रिपोर्ट में “पैठ बनाने वाली चोट” (penetrative injury) के स्पष्ट प्रमाण नहीं हैं।
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पीड़िता की ओर से यह याचिका दायर की गई कि उत्तर प्रदेश रानी लक्ष्मीबाई महिला सम्मान कोष नियम, 2015 के तहत उसे मुआवजा दिया जाए ।
कोर्ट की टिप्पणियां
न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की पीठ ने स्पष्ट किया कि POCSO अधिनियम की धारा 3 और 4 के तहत “पैठ बनाने वाला यौन हमला” साबित करने के लिए शारीरिक चोट का होना अनिवार्य नहीं है।
पीठ ने कहा,
“यह एक आम गलतफहमी है कि यौन उत्पीड़न में हमेशा शारीरिक चोट के निशान होंगे। पीड़ित की प्रतिक्रिया परिस्थितियों पर निर्भर करती है।”
अदालत ने यह भी कहा कि संचालन समिति कोई ट्रायल कोर्ट नहीं है और वह FIR व चार्जशीट में दर्ज अपराध की प्रकृति को नकार नहीं सकती।
अदालत ने रानी लक्ष्मीबाई महिला एवं बाल सम्मान कोष को एक “कल्याणकारी योजना” बताया, जिसे उदार दृष्टिकोण से लागू किया जाना चाहिए। पीठ के अनुसार, मुआवजा चोट के कारण नहीं, बल्कि अपराध सहने के कारण दिया जाता है।
अदालत का फैसला
हाईकोर्ट ने संचालन समिति के निर्णय को कानून के विपरीत बताते हुए रद्द कर दिया और राज्य सरकार को आदेश दिया कि पीड़िता को ₹3 लाख का मुआवजा 10 दिनों के भीतर दिया जाए।
इसी निर्देश के साथ याचिका का निस्तारण कर दिया गया।
Case Title:- Victim X in FIR No. 048 of 2025 v. State of Uttar Pradesh & Others
Case Number:- Writ – C No. 12085 of 2025
Date of Judgment:- January 14, 2026
Counsel for Petitioner: Anjum Ara
Counsel for State: Chief Standing Counsel (CSC)









