श्रीनगर स्थित जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट में निजी स्कूलों की फीस को लेकर चल रही एक अहम कानूनी लड़ाई पर आखिरकार परदा गिर गया। अदालत में माहौल गंभीर था। दोनों पक्षों की दलीलें लंबी रहीं और असरदार भी। सवाल सीधा था—क्या सरकार निजी, बिना सहायता प्राप्त स्कूलों की फीस तय कर सकती है, और अगर हां, तो कितनी हद तक?
मामले की पृष्ठभूमि
कई निजी स्कूलों ने हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया था। इन स्कूलों का कहना था कि वे बिना किसी सरकारी मदद के चल रहे हैं और ऐसे में उनकी फीस तय करने का अधिकार सरकार या उसकी बनाई किसी समिति को नहीं होना चाहिए।
चुनौती दी गई थी केंद्र सरकार द्वारा किए गए संशोधनों को, जिनके तहत जम्मू-कश्मीर स्कूल शिक्षा अधिनियम, 2002 में बदलाव कर Fee Fixation and Regulation Committee (FFRC) बनाई गई। इसी समिति ने स्कूलों की ट्यूशन और ट्रांसपोर्ट फीस तय करने के आदेश जारी किए थे।
स्कूलों का आरोप था कि ये आदेश ज़मीनी हालात देखे बिना और सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों की अनदेखी कर दिए गए।
अदालत की प्रमुख टिप्पणियां
दो-न्यायाधीशों की पीठ ने सुनवाई के दौरान साफ कहा कि शिक्षा कोई साधारण व्यापार नहीं है, लेकिन यह भी कल्पना में नहीं जिया जा सकता कि निजी स्कूल केवल दान के लिए चल रहे हैं।
पीठ ने कहा,
“निजी स्कूलों में निवेश, मेहनत और समय लगता है। ऐसे में उन्हें पूरी तरह मुनाफा रहित मानना ज़मीनी हकीकत से आंख चुराने जैसा होगा।”
अदालत ने यह भी माना कि सरकारी स्कूलों की गिरती स्थिति के कारण निजी स्कूलों की भूमिका बढ़ी है, खासकर जम्मू-कश्मीर जैसे क्षेत्रों में।
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FFRC पर कोर्ट का रुख
हाईकोर्ट ने FFRC के अस्तित्व को पूरी तरह गलत नहीं ठहराया, लेकिन उसकी भूमिका को सीमित और संतुलित बताया।
कोर्ट के शब्दों में,
“FFRC का मकसद हर स्कूल की फीस सूक्ष्म स्तर पर जांचना नहीं, बल्कि यह देखना है कि कहीं शिक्षा का व्यवसायीकरण या अनुचित मुनाफाखोरी तो नहीं हो रही।”
अदालत ने यह भी कहा कि
- सभी स्कूलों की फीस पर गहरी जांच व्यावहारिक नहीं
- केवल बड़े, शहरी स्कूलों या शिकायत वाले मामलों में ही सख्त जांच हो
- सामान्य परिस्थितियों में स्कूल द्वारा प्रस्तावित फीस को स्वीकार किया जाना चाहिए
ट्रांसपोर्ट फीस पर खास टिप्पणी
ट्रांसपोर्ट फीस को लेकर अदालत ने महत्वपूर्ण बात कही। पीठ ने माना कि ईंधन की कीमतें, बीमा और अन्य खर्च लगातार बढ़े हैं।
कोर्ट ने सुझाव दिया कि अगर ट्रांसपोर्ट फीस को नियंत्रित करना है तो FFRC को परिवहन विभाग और संबंधित विशेषज्ञ एजेंसियों की मदद लेनी चाहिए, न कि मनमाने प्रतिशत तय किए जाएं।
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अदालत का अंतिम निर्णय
लंबी सुनवाई और विस्तृत कानूनी चर्चा के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि
- FFRC का गठन और कानूनन ढांचा असंवैधानिक नहीं है
- लेकिन समिति को सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय सीमाओं में रहकर ही काम करना होगा
- फीस निर्धारण में स्कूलों की स्वायत्तता का सम्मान जरूरी है
- मुनाफाखोरी रोकना मकसद है, सामान्य संचालन में दखल नहीं
इसके साथ ही अदालत ने स्पष्ट किया कि समिति को विवेकपूर्ण, सीमित और न्यायसंगत तरीके से अपनी शक्तियों का प्रयोग करना चाहिए।
Case Title: New Convent High School & Ors vs Union of India
Case No.: WP(C) No. 1070/2022
Decision Date: 28 January 2026










