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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: आर्बिट्रेशन अवॉर्ड के बाद खरीदी संपत्ति भी कुर्क होगी, मां की अपील खारिज

आर. सावित्री नायडू बनाम मेसर्स द कॉटन कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड और अन्य। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आर्बिट्रेशन अवॉर्ड के बाद खरीदी संपत्ति भी कुर्क हो सकती है। R. Savithri Naidu की अपील खारिज, एग्जीक्यूशन दो माह में पूरी करने का आदेश।

Vivek G.
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: आर्बिट्रेशन अवॉर्ड के बाद खरीदी संपत्ति भी कुर्क होगी, मां की अपील खारिज

दिल्ली के कोर्ट नंबर में बुधवार को एक दिलचस्प बहस देखने को मिली। सवाल सीधा था-क्या किसी कंपनी के खिलाफ आर्बिट्रेशन अवॉर्ड आने के बाद, उसकी संपत्ति खरीदने वाला व्यक्ति खुद को “तीसरा पक्ष” बताकर कुर्की से बच सकता है?

Supreme Court of India ने साफ कर दिया-अगर खरीदारी मुकदमे या अवॉर्ड के बाद हुई है, तो सिर्फ बिक्री विलेख दिखा देने से जिम्मेदारी खत्म नहीं होती।

मामला R. Savithri Naidu बनाम M/s The Cotton Corporation of India Limited & Anr. से जुड़ा है।

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मामले की पृष्ठभूमि

साल 1998 में कॉटन बेल्स की बिक्री को लेकर M/s Lakshmi Ganesh Textiles Limited और The Cotton Corporation of India Limited के बीच समझौता हुआ था। भुगतान को लेकर विवाद बढ़ा और 1999 में आर्बिट्रेशन शुरू हुआ।

11 जून 2001 को आर्बिट्रेटर ने करीब 26 लाख रुपये के साथ 18% ब्याज का अवॉर्ड पारित किया। कंपनी ने इसे चुनौती दी, लेकिन 2013 में वह चुनौती खारिज हो गई।

इस बीच कंपनी पर बैंक का कर्ज भी था और SARFAESI कानून के तहत कार्यवाही चली। 2015 में एक त्रिपक्षीय समझौते के बाद कंपनी ने अपनी एक संपत्ति अपनी ही मैनेजिंग डायरेक्टर की मां, आर. सावित्री नायडू, के नाम बेच दी।

जब 2019 में कॉटन कॉरपोरेशन ने अवॉर्ड की वसूली के लिए एग्जीक्यूशन याचिका दाखिल की और 2021 में संपत्ति कुर्क हुई, तब सावित्री नायडू ने दावा किया-वह वैध खरीदार हैं, इसलिए कुर्की अवैध है।

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अपीलकर्ता का पक्ष

अपीलकर्ता की ओर से वरिष्ठ वकील ने दलील दी कि:

  • बिक्री 2015 में हुई, जब कोई मुकदमा लंबित नहीं था।
  • आर्बिट्रेशन का विषय संपत्ति नहीं, बल्कि पैसा था।
  • उन्होंने संपत्ति वैध मूल्य देकर खरीदी और उन्हें पुराने विवाद की जानकारी नहीं थी।

कोर्ट में यह भी कहा गया कि “एक निर्दोष खरीदार को दंडित नहीं किया जा सकता।”

कॉटन कॉरपोरेशन की दलील

कॉटन कॉरपोरेशन की ओर से कहा गया कि:

  • आर्बिट्रेशन 1999 में शुरू हुआ था और 2001 में अवॉर्ड आ गया था।
  • कंपनी की संपत्ति अवॉर्ड की वसूली के लिए उपलब्ध रहती है।
  • अपीलकर्ता कंपनी के प्रबंध निदेशक की मां हैं, इसलिए ‘बिना जानकारी’ का दावा विश्वसनीय नहीं।
  • त्रिपक्षीय समझौता पेश नहीं किया गया, जिससे संदेह और गहरा हुआ।

वकील ने जोर देकर कहा, “डिक्री को निष्प्रभावी बनाने के लिए संपत्ति का हस्तांतरण नहीं किया जा सकता।”

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सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि पहली नजर में मामला ऐसा लगता है जैसे किसी तीसरे व्यक्ति की संपत्ति कुर्क की जा रही हो। लेकिन रिकॉर्ड देखने के बाद तस्वीर अलग दिखी।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आर्बिट्रेशन अवॉर्ड, कानून की नजर में एक डिक्री के समान है।

पीठ ने कहा, “कोई भी निर्णयधारक (डिक्री होल्डर) तब तक न्याय नहीं पा सकता जब तक उसे वसूली का वास्तविक लाभ न मिले।”

अदालत ने Order 21 Rule 102 CPC का हवाला देते हुए कहा कि मुकदमे या डिक्री के बाद संपत्ति खरीदने वाला व्यक्ति ‘pendente lite transferee’ माना जाएगा और वह एग्जीक्यूशन में बाधा नहीं डाल सकता।

कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि अगर ऐसे खरीदारों को छूट दी जाए, तो “हर बार डिक्री होल्डर जब वसूली के लिए आगे बढ़ेगा, संपत्ति ट्रांसफर कर दी जाएगी और प्रक्रिया कभी पूरी नहीं होगी।”

त्रिपक्षीय समझौते पर सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने खास तौर पर नोट किया कि वह त्रिपक्षीय समझौता, जिसके आधार पर बैंक का कर्ज चुकाया गया और बिक्री हुई, रिकॉर्ड पर पेश नहीं किया गया।

पीठ ने कहा कि इस दस्तावेज के अभाव में यह मानना कठिन है कि खरीदार को कंपनी की देनदारियों की जानकारी नहीं थी।

कोर्ट ने माना कि SARFAESI की कार्यवाही अन्य दावों से स्वतः सुरक्षा नहीं देती।

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अंतिम निर्णय

अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि:

  • अपीलकर्ता ने संपत्ति आर्बिट्रेशन अवॉर्ड के बाद खरीदी।
  • वह ‘बिना जानकारी’ का दावा साबित नहीं कर पाईं।
  • एग्जीक्यूशन कार्यवाही वैध है।

इस आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने अपील खारिज कर दी और निचली अदालतों के आदेश को बरकरार रखा ।

साथ ही, एग्जीक्यूशन कोर्ट को निर्देश दिया गया कि वह दो महीने के भीतर वसूली प्रक्रिया पूरी करे।

कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “न्याय केवल कागज पर नहीं, वास्तविक रूप में मिलना चाहिए।”

Case Title: R. Savithri Naidu v. M/s The Cotton Corporation of India Limited & Anr.

Case No.: Civil Appeal No. of 2026 (arising out of SLP (C) No. 19779 of 2024)

Decision Date: 12 February 2026

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