नई दिल्ली की ठंडी सुबह में सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने एक ऐसा आदेश सुनाया, जिसका असर असम के हजारों परिवारों और लाखों हेक्टेयर जंगल पर पड़ेगा। मामला था असम के रिजर्व फॉरेस्ट क्षेत्रों में कथित अतिक्रमण और वहां दशकों से रह रहे लोगों की बेदखली का।
न्यायमूर्ति Alok Aradhe और न्यायमूर्ति Pamidighantam Sri Narasimha की बेंच ने साफ किया-जंगल बचाना राज्य का कर्तव्य है, लेकिन कानून के दायरे में रहकर।
यह फैसला Abdul Khalek & Others vs. The State of Assam & Others मामले में 10 फरवरी 2026 को सुनाया गया ।
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मामले की पृष्ठभूमि
अपीलकर्ता असम के डोयांग, साउथ नाम्बर, जमुना मदुंगा, बरपानी, लुतुमाई और गोलाघाट जैसे रिजर्व फॉरेस्ट इलाकों के कई गांवों के निवासी हैं। उनका कहना था कि वे और उनके पूर्वज 70 साल से अधिक समय से वहां रह रहे हैं। उनके पास आधार कार्ड, राशन कार्ड और अन्य पहचान पत्र भी हैं।
दूसरी ओर, राज्य सरकार का दावा था कि ये सभी भूमि 1887-88 में रिजर्व फॉरेस्ट घोषित की जा चुकी थी। सरकार के अनुसार, करीब 3,62,082 हेक्टेयर जंगल भूमि पर अतिक्रमण है-जो राज्य के कुल वन क्षेत्र का लगभग 19.92% है।
सरकार ने सात दिन के भीतर भूमि खाली करने के नोटिस जारी किए। इसी के खिलाफ याचिकाकर्ता पहले गुवाहाटी हाई कोर्ट गए, फिर मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
हाई कोर्ट की सिंगल जज बेंच ने कुछ मामलों में समय बढ़ाया, जबकि डिवीजन बेंच ने राज्य को नियम बनाने और 15 दिन का शो कॉज नोटिस देने का निर्देश दिया।
कुछ याचिकाकर्ताओं ने सीधे सुप्रीम कोर्ट में अनुच्छेद 32 के तहत याचिका दायर कर बेदखली पर रोक की मांग की।
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अदालत की अहम टिप्पणी: जंगल भी जरूरी, कानून भी
सुनवाई के दौरान बेंच ने साफ शब्दों में कहा:
“संविधान राज्य पर जंगल और पर्यावरण की रक्षा का दायित्व डालता है, लेकिन यह दायित्व मनमाने ढंग से कार्रवाई की अनुमति नहीं देता।”
अदालत ने याद दिलाया कि संविधान के अनुच्छेद 48A में राज्य को पर्यावरण और वन की रक्षा का निर्देश है, जबकि अनुच्छेद 51A(g) हर नागरिक पर पर्यावरण की रक्षा का कर्तव्य डालता है।
लेकिन साथ ही बेंच ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण और कानून का शासन-दोनों साथ-साथ चलेंगे।
राज्य सरकार की नई प्रक्रिया
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल ने अतिरिक्त हलफनामा दाखिल किया। उसमें एक विस्तृत प्रक्रिया बताई गई:
- वन और राजस्व अधिकारियों की संयुक्त समिति बनेगी।
- कथित अतिक्रमणकारियों को नोटिस दिया जाएगा।
- उन्हें अपने अधिकार के समर्थन में दस्तावेज पेश करने का अवसर मिलेगा।
- अगर भूमि राजस्व क्षेत्र में पाई गई, तो मामला राजस्व विभाग को भेजा जाएगा।
- यदि अतिक्रमण साबित हुआ, तो “स्पीकिंग ऑर्डर” (कारणयुक्त आदेश) जारी होगा और 15 दिन का समय दिया जाएगा।
- केवल उसके बाद ही बेदखली की कार्रवाई होगी।
- जिनका नाम ‘जमाबंदी रजिस्टर’ में है या जिन्हें वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत अधिकार मिले हैं, उन्हें बेदखल नहीं किया जाएगा।
बेंच ने इस प्रक्रिया को “पर्याप्त सुरक्षा उपायों” वाला बताया।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम आदेश
अदालत ने कहा कि राज्य द्वारा बनाई गई प्रक्रिया निष्पक्षता और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप है।
बेंच ने निर्देश दिया:
- जब तक समिति जांच कर कारणयुक्त आदेश नहीं देती और 15 दिन की नोटिस अवधि समाप्त नहीं होती, तब तक यथास्थिति (status quo) बनाए रखी जाएगी।
- सभी पक्ष अपनी दलीलें समिति के सामने रख सकेंगे।
- कोर्ट ने किसी पक्ष के दावे के गुण-दोष पर कोई अंतिम राय नहीं दी।
हाई कोर्ट के 18 अगस्त 2025 और नवंबर 2025 के आदेशों में संशोधन करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अपीलों और रिट याचिकाओं का निपटारा कर दिया।
अंत में अदालत ने स्पष्ट किया-“कोई लागत नहीं।”
Case Title: Abdul Khalek & Others vs. The State of Assam & Others
Case No.: Civil Appeal Nos. of 2026 (@ SLP (C) Nos. 23647-23648 of 2025) & Connected Matters
Decision Date: 10 February 2026










