सुप्रीम कोर्ट ने हरिद्वार की एक जमीन से जुड़े लंबे विवाद में साफ किया है कि जब किसी संपत्ति पर मालिकाना हक और कब्जे को लेकर गंभीर विवाद हो, तब सिर्फ दीवार हटाने जैसी अनिवार्य निषेधाज्ञा (Mandatory Injunction) की मांग पर्याप्त नहीं होती। ऐसे मामलों में सही रास्ता होता है-कब्जा वापस पाने के लिए पूरा मुकदमा दायर करना।
यह फैसला संजय पालीवाल और अन्य बनाम भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (BHEL) मामले में आया है, जहां अदालत ने हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए अपील खारिज कर दी।
मामले की पृष्ठभूमि
संजय पालीवाल और उनके साझेदारों ने दावा किया था कि उन्होंने हरिद्वार के अहमदपुर करच्छ इलाके में 15 बिस्वा जमीन खरीदी है। उनका कहना था कि BHEL ने सड़क की ओर एक दीवार खड़ी कर दी, जिससे उनकी जमीन तक पहुंच बंद हो गई।
इस पर उन्होंने अदालत से मांग की कि BHEL को दीवार हटाने का आदेश दिया जाए।
ट्रायल कोर्ट और बाद में जिला अदालत ने वादियों के पक्ष में फैसला दिया और दीवार हटाने का आदेश भी दिया। लेकिन BHEL हाईकोर्ट पहुंचा। वहां मामला पलट गया-हाईकोर्ट ने कहा कि यह सिर्फ दीवार हटाने का नहीं, बल्कि कब्जे और मालिकाना हक का विवाद है, इसलिए सही उपाय कब्जा दिलाने का मुकदमा है, न कि केवल इंजंक्शन।
वादियों की ओर से कहा गया कि निचली अदालतों ने सबूत देखकर साफ माना था कि जमीन उन्हीं की है और BHEL ने गलत तरीके से रास्ता रोका। ऐसे में हाईकोर्ट को तथ्यों में दखल नहीं देना चाहिए था।
BHEL की तरफ से जवाब था कि जमीन की पहचान ही साफ नहीं है-किस हिस्से पर दीवार बनी है, यह साबित नहीं हुआ। साथ ही, जब मालिकाना हक और कब्जा दोनों पर विवाद है, तो कानून कहता है कि सिर्फ इंजंक्शन नहीं, बल्कि कब्जे की मांग जरूरी है।
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सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणियां
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने इस पूरे विवाद को ध्यान से सुनने के बाद साफ शब्दों में कहा कि-
“जब संपत्ति पर हक और कब्जा दोनों को लेकर गंभीर विवाद हो, तो केवल निषेधाज्ञा का मुकदमा पर्याप्त उपाय नहीं माना जा सकता।”
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि निचली अदालतों ने यह मान लिया था कि जमीन पूरी तरह वादियों की है, जबकि रिकॉर्ड से पता चलता है कि जमीन की पहचान, माप और दीवार की सही जगह को लेकर स्पष्ट सबूत नहीं थे।
पीठ ने हाईकोर्ट की उस बात से सहमति जताई कि अगर किसी की जमीन पर दीवार खड़ी हो चुकी है और इससे कब्जा प्रभावित हुआ है, तो सबसे प्रभावी उपाय कब्जा वापस पाने का दावा होता है, न कि सिर्फ दीवार हटाने की मांग।
कानून का साफ संदेश
सुप्रीम कोर्ट ने पुराने फैसलों का हवाला देते हुए यह अंतर भी समझाया कि-
- अगर कोई व्यक्ति लाइसेंस पर यानी अनुमति से जगह पर बैठा था और बाद में नहीं हट रहा, तो कभी-कभी केवल इंजंक्शन से भी काम चल सकता है।
- लेकिन जहां मालिकाना हक पर ही सवाल हो और दोनों पक्ष खुद को मालिक बता रहे हों, वहां मामला गंभीर होता है और पूरा दीवानी मुकदमा जरूरी हो जाता है।
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अंतिम फैसला
इन सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को सही माना और वादियों की अपील खारिज कर दी।
अदालत ने कहा कि इस मामले में केवल दीवार हटाने का आदेश देना कानूनन सही नहीं था, क्योंकि जमीन के स्वामित्व और कब्जे पर ही बड़ा विवाद मौजूद है। इसलिए हाईकोर्ट द्वारा मुकदमा खारिज किया जाना उचित है।
Case Title: Sanjay Paliwal & Anr. vs. Bharat Heavy Electricals Ltd.
Case No.: Civil Appeal No. 6075 of 2016
Decision Date: January 15, 2026










