नई दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट की आपराधिक अपीलीय पीठ ने हिमाचल प्रदेश के एक सनसनीखेज मामले में अहम फैसला सुनाया। पत्नी को जलाकर मारने के आरोप में दोषी ठहराए गए पति को हाईकोर्ट ने जो राहत दी थी, उसे शीर्ष अदालत ने रद्द कर दिया। कोर्ट ने साफ कहा-इस केस में मृतका का डाइंग डिक्लेरेशन भरोसेमंद है और उसी के आधार पर सजा बहाल की जाती है।
मामले की पृष्ठभूमि
मामला चंबा ज़िले के गांव रामपुर का है। 7 दिसंबर 2009 को सरो देवी गंभीर रूप से जली हालत में मिलीं। आरोप था कि पति चमन लाल ने उन पर केरोसिन डालकर आग लगा दी। पड़ोसियों और परिजनों ने उन्हें अस्पताल पहुंचाया, लेकिन कई हफ्तों तक इलाज के बाद 15 जनवरी 2010 को उनकी मौत हो गई।
Read also:- लंबित आपराधिक मामलों के चलते वकील नामांकन पर रोक: मद्रास हाईकोर्ट ने बड़े मुद्दे को बड़ी पीठ को सौंपा
जांच में तहसीलदार ने अस्पताल में सरो देवी का बयान दर्ज किया-इसे ही बाद में डाइंग डिक्लेरेशन माना गया। ट्रायल कोर्ट ने इसी बयान और साक्ष्यों के आधार पर पति को आजीवन कारावास की सजा सुनाई।
हालांकि, 2014 में हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने संदेह का लाभ देते हुए आरोपी को बरी कर दिया।
अदालत का अवलोकन
राज्य सरकार की अपील पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने हाईकोर्ट के फैसले को गंभीरता से परखा। कोर्ट ने कहा कि डाइंग डिक्लेरेशन एक मजबूत कानूनी साक्ष्य है, बशर्ते वह स्वेच्छा से और सही हालत में दिया गया हो।
पीठ ने रिकॉर्ड देखकर पाया कि बयान तहसीलदार जैसे स्वतंत्र अधिकारी ने डॉक्टर की अनुमति के बाद लिया था। मौके पर मौजूद अधिकारियों और परिजनों की गवाही भी इसे समर्थन देती है।
Read also:- ईमानदार अफसरों की सुरक्षा जरूरी, पर जांच भी नहीं रुकेगी: धारा 17A पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी
कोर्ट ने टिप्पणी की,
“डाइंग डिक्लेरेशन यदि स्वेच्छा, स्पष्ट और भरोसेमंद हो, तो उसी के आधार पर दोष सिद्ध किया जा सकता है।”
हाईकोर्ट ने जिस आधार पर बयान को शक के दायरे में रखा था-जैसे समय को लेकर हल्की असंगतियां-उन्हें सुप्रीम कोर्ट ने मामूली और गैर-निर्णायक बताया।
Evidence पर सुप्रीम कोर्ट की नजर
सुनवाई के दौरान पीठ ने दो अहम बातों पर जोर दिया-
- मेडिकल फिटनेस: बयान दर्ज करते समय डॉक्टर की राय ली गई थी कि पीड़िता बोलने की हालत में है।
- स्वतंत्रता: बयान किसी पुलिस दबाव में नहीं, बल्कि कार्यपालिका मजिस्ट्रेट द्वारा दर्ज हुआ।
कोर्ट ने कहा कि शुरुआती एफआईआर में आरोपी का नाम न आना स्वाभाविक हो सकता है, क्योंकि उस वक्त परिवार की प्राथमिकता पीड़िता की जान बचाना थी। बाद में दिया गया बयान, जब स्थिति संभली, ज्यादा विश्वसनीय माना जाएगा।
Read also:- सरकारी जमीन विवाद पर सुप्रीम कोर्ट की रोक: SASTRA यूनिवर्सिटी की बेदखली पर फिलहाल विराम
फ़ैसला
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के बरी करने वाले फैसले को “सबूतों की गलत व्याख्या” बताते हुए रद्द कर दिया। ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई उम्रकैद की सजा बहाल कर दी गई है।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि आरोपी तुरंत आत्मसमर्पण करे, ताकि शेष सजा काटी जा सके। यदि वह ऐसा नहीं करता, तो ट्रायल कोर्ट कानून के अनुसार कार्रवाई करेगा।
Case Title: State of Himachal Pradesh vs. Chaman Lal
Case No.: Criminal Appeal No. 430 of 2018
Decision Date: January 15, 2026










