इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक पारिवारिक विवाद से जुड़े आपराधिक मामले में बड़ा हस्तक्षेप करते हुए उस समन आदेश को रद्द कर दिया, जिसके आधार पर पत्नी को अदालत में तलब किया गया था। कोर्ट ने कहा कि जिन धाराओं में मामला दर्ज हुआ, वे गैर-संज्ञेय थीं और पुलिस ने शुरुआत से ही कानून की सही प्रक्रिया का पालन नहीं किया। यह फैसला 14 जनवरी 2026 को सुनाया गया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला अलीगढ़ जिले से जुड़ा है। पति ने पत्नी के खिलाफ धारा 504 और 507 आईपीसी के तहत एफआईआर दर्ज कराई थी। आरोप था कि पत्नी ने सोशल मीडिया के जरिए मानहानि की और धमकी दी। पुलिस ने जांच के बाद क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी थी, यानी उसे कोई ठोस सबूत नहीं मिला।
Read also:- लंबित आपराधिक मामलों के चलते वकील नामांकन पर रोक: मद्रास हाईकोर्ट ने बड़े मुद्दे को बड़ी पीठ को सौंपा
इसके बाद पति ने मजिस्ट्रेट के सामने प्रोटेस्ट पिटिशन दी, जिसे स्वीकार करते हुए 23 अक्टूबर 2024 को संज्ञान लेकर पत्नी को समन भेजा गया।
हाईकोर्ट में क्या उठा सवाल
पत्नी ने इस आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। दलील दी गई कि जिन धाराओं में मामला दर्ज हुआ, वे गैर-संज्ञेय हैं। ऐसे मामलों में पुलिस को सीधे एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू करने का अधिकार नहीं होता, बल्कि पहले मजिस्ट्रेट की अनुमति जरूरी होती है।
कोर्ट के सामने यह भी रखा गया कि जांच अधिकारी ने क्लोजर रिपोर्ट दे दी थी, इसके बावजूद मजिस्ट्रेट ने उसे राज्य का मामला मानकर आगे बढ़ा दिया, जो कानून के मुताबिक सही नहीं था।
अदालत की अहम टिप्पणियां
जस्टिस प्रवीण कुमार गिरी ने सुनवाई के दौरान कहा कि गैर-संज्ञेय अपराध में पुलिस का पहला कदम एनसीआर दर्ज करना होता है, न कि एफआईआर। अदालत ने साफ शब्दों में कहा,
“जब कानून किसी खास प्रक्रिया का रास्ता दिखाता है, तो उससे हटकर की गई कार्रवाई व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर सीधा असर डालती है।”
कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि अगर जांच में आरोप झूठे पाए जाते हैं, तो संबंधित अधिकारियों पर यह जिम्मेदारी बनती है कि वे गलत सूचना देने के मामलों में भी तय कानूनी कदम उठाएं।
Read also:- ईमानदार अफसरों की सुरक्षा जरूरी, पर जांच भी नहीं रुकेगी: धारा 17A पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी
हाईकोर्ट के अनुसार, मजिस्ट्रेट को यह देखना चाहिए था कि मामला गैर-संज्ञेय है, इसलिए संज्ञान शिकायत के रूप में लिया जाना चाहिए था, न कि पुलिस केस की तरह।
इसके अलावा, अदालत ने यह भी कहा कि नए आपराधिक कानूनों के लागू होने के बाद ऐसे मामलों में आरोपित को सुनवाई का अवसर देना जरूरी है, जो यहां नहीं दिया गया।
कोर्ट का फैसला
सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने 23 अक्टूबर 2024 का संज्ञान-सह-समन आदेश और उससे जुड़ी पूरी कार्यवाही रद्द कर दी। कोर्ट ने माना कि यह मामला प्रक्रिया की अनदेखी का उदाहरण है और इसे आगे बढ़ाना न्याय के हित में नहीं होगा।
Case Title: Umme Farva vs State of U.P. & Another
Case No.: Application U/S 528 BNSS No. 12575 of 2025
Case Type: Criminal Miscellaneous Application
Decision Date: 14 January 2026










