छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने मंगलवार को एक अहम फैसले में उस गिफ्ट डीड को रद्द करने के आदेश को बरकरार रखा, जिसमें बुज़ुर्ग दंपती ने अपने भतीजे के नाम मकान दान किया था। कोर्ट ने साफ कहा कि यदि बुज़ुर्गों की देखभाल नहीं की जाती, तो भले ही दानपत्र में शर्त लिखी न हो, उसे रद्द किया जा सकता है। यह फैसला बिलासपुर स्थित हाईकोर्ट ने रिट याचिका खारिज करते हुए सुनाया।
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की एकल पीठ ने मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल और अपीलीय प्राधिकरण के आदेशों में दखल देने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि वरिष्ठ नागरिकों के हित में बने कानून की व्याख्या संकीर्ण दृष्टि से नहीं की जा सकती।
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मामले की पृष्ठभूमि
विवाद बिलासपुर के कंचन विहार स्थित एक मकान को लेकर था। बुज़ुर्ग दंपती ने वर्ष 2016 में यह संपत्ति अपने भतीजे के नाम गिफ्ट डीड के ज़रिये दी थी। उनका कहना था कि भतीजे ने जीवनभर देखभाल का भरोसा दिया था। लेकिन बाद में उन्हें कथित रूप से प्रताड़ित किया गया और घर से बाहर कर दिया गया, जिसके बाद वे वृद्धाश्रम में रहने को मजबूर हुए।
याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि गिफ्ट डीड बिना किसी शर्त के थी, इसलिए उसे रद्द नहीं किया जा सकता। उन्होंने ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट का हवाला देते हुए कहा कि जब तक लिखित शर्त न हो, दानपत्र वैध रहता है। दूसरी ओर, बुज़ुर्ग दंपती और राज्य सरकार ने कहा कि दान प्रेम और देखभाल की अपेक्षा पर किया गया था, जिसे पूरा नहीं किया गया।
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अदालत की मुख्य टिप्पणियां
एकल पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि ,
“वरिष्ठ नागरिकों के कल्याण से जुड़ा यह कानून लाभकारी प्रकृति का है और इसकी व्याख्या उसके उद्देश्य को ध्यान में रखकर की जानी चाहिए।”
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कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि देखभाल की शर्त हमेशा लिखित रूप में होना ज़रूरी नहीं है। परिस्थितियों, संबंधों और पक्षों के आचरण से भी यह शर्त साबित हो सकती है।
The Final Order
अदालत ने माना कि याचिकाकर्ता बुज़ुर्गों की बुनियादी जरूरतें पूरी करने में विफल रहे। ऐसे में मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल द्वारा गिफ्ट डीड को शून्य घोषित करना सही था।
हाईकोर्ट ने रिट याचिका खारिज कर दी और अंतरिम संरक्षण भी समाप्त कर दिया।
Case Title: Ramkishna Pandey & Anr. v. State of Chhattisgarh & Ors.
Case Number: Writ Petition (Civil) No. 87 of 2025
Judgment Delivered On: 20 January 2026










