नई दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट ने दो नाबालिग बच्चों की कस्टडी को लेकर चल रहे लंबे विवाद में अहम आदेश दिया। न्यायालय ने जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें मां को बच्चों की कस्टडी लौटाने का निर्देश दिया गया था, और पूरे मामले को फिर से सुनवाई के लिए हाईकोर्ट को वापस भेज दिया। यह मामला मोहतशेम बिल्लाह मलिक और सना आफ़ताब के बीच है, जिनके दो बेटे हैं।
मामले की पृष्ठभूमि
दोनों की शादी 2015 में श्रीनगर में हुई थी और बाद में वे कतर में रहने लगे, जहां उनके दोनों बेटे पैदा हुए। आपसी मतभेद के बाद कतर की फैमिली कोर्ट ने 2022 में तलाक की डिक्री दी। उस समय बच्चों की कस्टडी मां को और अभिभावक (गार्डियन) का दर्जा पिता को दिया गया था, जबकि पासपोर्ट पिता के पास रहने थे।
Read also:- सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट का आदेश पलटा: कहा, Article 227 से सीधे plaint नहीं हटाई जा सकती
बाद में मां अगस्त 2022 में बच्चों को भारत ले आईं। आरोप लगा कि यह कदम पिता की जानकारी और कतर कोर्ट की अनुमति के बिना उठाया गया। पिता ने इसे “अवैध कस्टडी” बताते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की। उस कार्यवाही के दौरान मां ने अदालत को भरोसा दिया था कि वह बच्चों को पढ़ाई के लिए वापस कतर ले जाएंगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
इस बीच कतर की अदालत ने अक्टूबर 2023 में मां के पक्ष में दी गई कस्टडी का आदेश रद्द कर दिया और बच्चों की कस्टडी पिता को देने का निर्देश दिया। वहीं श्रीनगर में अवमानना अदालत ने भी मां को अपने वचन का उल्लंघन करने का दोषी माना और जुर्माना लगाया।
फैमिली कोर्ट, श्रीनगर ने जनवरी 2025 में बच्चों की कस्टडी पिता को सौंप दी थी, लेकिन हाईकोर्ट ने सितंबर 2025 में उस आदेश को पलटते हुए फिर से मां को कस्टडी दे दी। सुप्रीम कोर्ट में इस फैसले को चुनौती दी गई।
Read also:- दिल्ली हाईकोर्ट ने अभिनेता राजपाल यादव को राहत देने से किया इनकार, आज शाम 4 बजे तक आत्मसमर्पण का आदेश
सुनवाई के दौरान पिता की ओर से दलील दी गई कि बच्चों को पढ़ाई के बीच में कतर से हटा लिया गया, जिससे उनकी शिक्षा प्रभावित हुई। यह भी कहा गया कि बच्चों की स्कूल में उपस्थिति कम रही और वे पिता के साथ रहने में अधिक सहज हैं। दूसरी ओर, मां की तरफ से कहा गया कि बच्चों की भलाई ही सबसे बड़ा सवाल है और वे श्रीनगर में अच्छी तरह पढ़ रहे हैं।
न्यायमूर्ति पंकज मिथल और न्यायमूर्ति एस.वी.एन. भट्टी की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि बच्चों की भलाई सबसे अहम है, लेकिन इसे तय करते समय माता-पिता का आचरण, अदालतों के पुराने आदेश और बच्चों की शिक्षा जैसे पहलुओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने पाया कि हाईकोर्ट ने कतर कोर्ट के आदेश, अवमानना के फैसले और मां के आचरण के असर पर ठीक से विचार नहीं किया।
Read also:- निजी स्कूलों की फीस पर सरकार की पकड़ को लेकर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, जम्मू-कश्मीर में FFRC की भूमिका तय
“इन तथ्यों का सामूहिक असर कस्टडी तय करने में अहम है,” पीठ ने कहा।
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का 8 सितंबर 2025 का आदेश रद्द कर दिया और मामले को नए सिरे से, कानून के मुताबिक, जल्दी सुनवाई के लिए हाईकोर्ट को वापस भेज दिया। कोर्ट ने कहा कि चार महीने के भीतर इस पर फैसला किया जाना चाहिए।
इसी के साथ अपील स्वीकार कर ली गई और लागत पर कोई आदेश नहीं दिया गया।
Case Title:- Mohtashem Billah Malik vs. Sana Aftab










