नई दिल्ली में शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट की आपराधिक पीठ में माहौल गंभीर था। अदालत ने एक डेंटिस्ट पति को राहत देते हुए उस मामले में ज़मानत दे दी, जिसमें उस पर पत्नी की मौत को लेकर गंभीर आरोप लगाए गए थे। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट कहा कि इस स्तर पर यह मामला आत्महत्या के लिए उकसावे से जुड़ा प्रतीत होता है और हत्या या दहेज हत्या का ठोस आधार प्रथम दृष्टया नहीं बनता।
मामले की पृष्ठभूमि
अपीलकर्ता डॉ. अभिजीत पांडे, मध्य प्रदेश के भोपाल में एक निजी क्लिनिक चलाते हैं। उनकी मुलाकात क्लिनिक के माध्यम से डॉ. ऋचा पांडे से हुई थी। करीब डेढ़ साल के रिश्ते के बाद दोनों ने 4 दिसंबर 2024 को शादी की।
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21 मार्च 2025 की सुबह डॉ. ऋचा अपने कमरे से बाहर नहीं आईं। दरवाज़ा अंदर से बंद था। तोड़कर अंदर जाने पर वह अचेत अवस्था में मिलीं और अस्पताल ले जाने पर उन्हें मृत घोषित कर दिया गया।
शुरुआत में इसे आत्महत्या माना गया, लेकिन 24 मार्च को मृतका के भाई की शिकायत पर मामला दर्ज हुआ। आरोप था कि पति का अपनी क्लिनिक में काम करने वाली महिला से संबंध था, जिससे मानसिक तनाव में आकर ऋचा ने जान दे दी।
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने अक्टूबर 2025 में नियमित ज़मानत याचिका खारिज कर दी थी। हाईकोर्ट ने अपराध की गंभीरता का हवाला देते हुए कहा था कि इस स्तर पर राहत नहीं दी जा सकती। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
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अदालत की टिप्पणियां
जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री को विस्तार से देखा।
अदालत ने नोट किया कि:
- एफआईआर में दहेज की मांग का कोई आरोप नहीं था।
- माता-पिता और भाई के शुरुआती बयानों में भी दहेज का ज़िक्र नहीं मिला।
- दहेज से जुड़े आरोप बाद के बयानों में जोड़े गए।
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पीठ ने कहा,
“एफआईआर मूल रूप से आत्महत्या के लिए उकसावे से संबंधित थी। प्रथम दृष्टया ऐसा कोई ठोस आधार नहीं दिखता जिससे हत्या या दहेज हत्या का मामला स्पष्ट रूप से बनता हो।”
पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट पर चर्चा करते हुए अदालत ने कहा कि इंजेक्शन से जुड़े निशान स्वयं द्वारा भी लगाए जा सकते हैं, और मृत्यु का कारण एट्राक्यूरियम बेसिलेट नामक एनेस्थीसिया दवा बताया गया है। मृतका स्वयं एक एनेस्थेटिस्ट थीं, यह तथ्य भी अदालत ने महत्व का माना।
राज्य सरकार और मृतका के परिवार ने ज़मानत का विरोध किया। उनका कहना था कि इंजेक्शन देकर हत्या की गई और शरीर पर चोटों के निशान हैं। लेकिन कोर्ट ने कहा कि इन चोटों और मृत्यु के बीच सीधा संबंध इस स्तर पर स्पष्ट नहीं है।
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सुप्रीम कोर्ट का फैसला
सभी पहलुओं पर विचार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार कर ली।
पीठ ने आदेश दिया,
“अपीलकर्ता को ट्रायल कोर्ट द्वारा तय शर्तों पर ज़मानत पर रिहा किया जाए। वह गवाहों को प्रभावित नहीं करेगा और मुकदमे में पूरा सहयोग करेगा।”
इसके साथ ही अदालत ने साफ किया कि यह टिप्पणियां केवल ज़मानत के लिए हैं, और ट्रायल कोर्ट मामले का फैसला अपने गुण-दोष के आधार पर करेगा।
Case Title: Abhijit Pandey v. State of Madhya Pradesh & Anr.
Case Number: Criminal Appeal No. 446 of 2026
(arising out of SLP (Criminal) No. 16817 of 2025)
Date of Judgment: January 23, 2026










