भारत का सर्वोच्च न्यायालय ने पंचायत चुनाव से जुड़े एक अहम मामले में साफ कहा है कि जब राज्य कानून में चुनाव याचिका का स्पष्ट प्रावधान मौजूद हो, तब हाईकोर्ट को बीच में दखल नहीं देना चाहिए। उत्तराखंड के जिला पंचायत सदस्य चुनाव से जुड़े इस विवाद में शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश को रद्द कर दिया। यह फैसला 2 फरवरी 2026 को सुनाया गया।
मामले की पृष्ठभूमि
उत्तराखंड में पंचायत चुनाव दोबारा शुरू होने के बाद पिथौरागढ़ जिले की एक जिला पंचायत सीट से नरेंद्र सिंह देओपा ने नामांकन दाखिल किया था। उनके प्रतिद्वंद्वी संदीप सिंह बोरा ने आपत्ति उठाई कि नामांकन में जरूरी जानकारी का खुलासा नहीं किया गया है।
इस आपत्ति पर रिटर्निंग ऑफिसर ने 9 जुलाई 2025 को देओपा का नामांकन रद्द कर दिया। इसके खिलाफ देओपा ने उत्तराखंड उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल की। एकल न्यायाधीश ने 11 जुलाई 2025 को यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि चुनाव प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और ऐसे मामलों में हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता।
उसी दिन संदीप सिंह बोरा निर्विरोध निर्वाचित घोषित कर दिए गए।
एकल न्यायाधीश के फैसले के खिलाफ देओपा ने इंट्रा-कोर्ट अपील दायर की। डिवीजन बेंच ने 18 जुलाई 2025 को एकल पीठ के आदेश पर रोक लगा दी और रिटर्निंग ऑफिसर को निर्देश दिया कि देओपा को चुनाव चिन्ह आवंटित कर चुनाव लड़ने दिया जाए।
इसी अंतरिम आदेश को चुनौती देते हुए संदीप सिंह बोरा सुप्रीम कोर्ट पहुंचे।
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और टिप्पणियां
मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की अध्यक्षता वाली पीठ ने चुनावी मामलों में न्यायिक संयम पर जोर दिया। अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 243-O में स्पष्ट प्रावधान है कि पंचायत चुनाव को केवल चुनाव याचिका के जरिए ही चुनौती दी जा सकती है।
पीठ ने कहा,
“जब राज्य कानून चुनाव विवाद के समाधान के लिए पूरा और प्रभावी तंत्र देता है, तब अनुच्छेद 226 के तहत हस्तक्षेप असाधारण परिस्थितियों में ही होना चाहिए।”
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उत्तराखंड पंचायती राज अधिनियम, 2016 की धारा 131H नामांकन रद्द होने जैसे मामलों के लिए विशेष उपाय प्रदान करती है। ऐसे में सीधे रिट याचिका दाखिल करना उचित नहीं था।
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि हाईकोर्ट ने तीन बड़ी गलतियां कीं- पहली, संविधान में तय प्रतिबंध के बावजूद चुनाव प्रक्रिया में दखल दिया। दूसरी, ऐसे समय निर्देश दिए जब उम्मीदवार पहले ही निर्विरोध निर्वाचित घोषित हो चुका था। तीसरी, जिस व्यक्ति पर आदेश का सीधा असर पड़ता था, उसे सुने बिना राहत दे दी गई।
अदालत ने कहा,
“चुनाव एक सार्वजनिक प्रक्रिया है। व्यक्तिगत शिकायतों के आधार पर इसे रोकना या बदलना लोकतांत्रिक व्यवस्था के हित में नहीं है।”
अंतिम फैसला
इन सभी कारणों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड हाईकोर्ट के 18 जुलाई 2025 के अंतरिम आदेश को रद्द कर दिया और विशेष अपील खारिज कर दी। इसके साथ ही संदीप सिंह बोरा की अपील स्वीकार कर ली गई।
फैसले पर न्यायमूर्ति संदीप मेहता ने भी सहमति जताई। अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि पंचायत चुनाव से जुड़े विवादों का समाधान केवल चुनाव याचिका के जरिए ही किया जाना चाहिए, न कि बीच में न्यायिक हस्तक्षेप से।
Case Title: Sandeep Singh Bora v. Narendra Singh Deopa & Others










