सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को भूमि अधिग्रहण से जुड़े सैकड़ों मामलों पर एक साथ सुनवाई हुई। अदालत में माहौल गंभीर था, क्योंकि सवाल केवल कानूनी समय-सीमा का नहीं, बल्कि ज़मीन मालिकों के अधिकारों का भी था। कोर्ट के सामने मुख्य मुद्दा यह था कि क्या सरकार भूमि अधिग्रहण कानून, 2013 के तहत अपील दायर करने में हुई देरी को लिमिटेशन एक्ट, 1963 की धारा 5 के ज़रिये माफ करा सकती है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद कर्नाटक में ज़मीन अधिग्रहण से जुड़े मामलों से शुरू हुआ। राज्य के डिप्टी कमिश्नर और विशेष भूमि अधिग्रहण अधिकारी ने विभिन्न मामलों में देरी से अपीलें दायर की थीं। सरकार का तर्क था कि प्रशासनिक प्रक्रियाओं और विभागीय पत्राचार के कारण देरी हुई, इसलिए इसे माफ किया जाना चाहिए।
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दूसरी ओर, ज़मीन मालिकों और कंपनियों-जिनमें एम/एस एस.वी. ग्लोबल मिल लिमिटेड भी शामिल थी-ने साफ कहा कि भूमि अधिग्रहण कानून, 2013 एक अलग और पूर्ण कानून है, जिसमें समय-सीमा को लेकर कोई ढील नहीं दी जा सकती।
कोर्ट में मुख्य सवाल
सुनवाई के दौरान पीठ ने एक सीधा सवाल रखा-
क्या भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन अधिकार अधिनियम, 2013 के तहत तय अपील की समय-सीमा पर लिमिटेशन एक्ट लागू हो सकता है?
अदालत ने यह भी पूछा कि क्या सरकारी विभागों को सिर्फ इसलिए राहत दी जा सकती है क्योंकि उनके यहां फाइलें एक टेबल से दूसरी टेबल तक घूमती हैं।
अदालत की अहम टिप्पणियां
पीठ ने अपने फैसले में साफ शब्दों में कहा कि 2013 का कानून एक स्वतंत्र और आत्मनिर्भर (self-contained) कानून है। इसमें हर चरण के लिए सख्त समय-सीमा तय की गई है।
अदालत ने टिप्पणी की,
“जहां कानून ने स्पष्ट समय-सीमा तय कर दी हो, वहां अदालतें उसे दरकिनार नहीं कर सकतीं।”
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कोर्ट ने यह भी कहा कि सरकारी विभागों के लिए अलग मापदंड नहीं हो सकते।
“सिर्फ यह कह देना कि देरी सरकारी प्रक्रियाओं के कारण हुई, पर्याप्त कारण नहीं है।”
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि लिमिटेशन एक्ट की धारा 5 तभी लागू होती है, जब संबंधित कानून इसकी अनुमति देता हो। लेकिन भूमि अधिग्रहण कानून, 2013 में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है।
अदालत ने माना कि इस कानून का उद्देश्य ज़मीन मालिकों को तेज़ और प्रभावी न्याय देना है। अगर देरी को आसानी से माफ किया गया, तो पूरे कानून का मकसद ही कमजोर हो जाएगा।
अंतिम फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की सभी अपीलें खारिज कर दीं। अदालत ने कहा कि 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून के तहत अपील दायर करने में हुई देरी को माफ नहीं किया जा सकता।
इस तरह, कोर्ट ने ज़मीन मालिकों के पक्ष में फैसला सुनाते हुए यह साफ कर दिया कि कानून की समय-सीमा सभी के लिए समान है-चाहे वह आम नागरिक हो या सरकार।
Case Title: The Deputy Commissioner and Special Land Acquisition Officer vs. M/s S.V. Global Mill Limited
Case No.: Civil Appeal arising out of SLP (C) Nos. 215–216 of 2023 & connected matters
Decision Date: 9 February 2026










