पटना हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवाद से जुड़े एक अहम मामले में साफ कहा है कि अगर विवाह ही कानूनी रूप से वैध नहीं है, तो पति के रिश्तेदारों के खिलाफ घरेलू क्रूरता जैसे आपराधिक आरोप टिक नहीं सकते। जस्टिस रुद्र प्रकाश मिश्रा की एकल पीठ ने बेगूसराय की महिला द्वारा दायर शिकायत के आधार पर जारी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला बेगूसराय जिले से जुड़ा है, जहां शिकायतकर्ता महिला ने आरोप लगाया था कि उसकी शादी सुमित कुमार से हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुई थी। महिला पहले से तलाकशुदा थी और उसका एक नाबालिग बेटा भी था। शिकायत के अनुसार, शादी के बाद उसे किराये के मकान में रखा गया और पति व उसके परिजनों ने उसके साथ शारीरिक और मानसिक क्रूरता की।
Read also:- राजस्थान ACB को केंद्र कर्मचारियों पर भी भ्रष्टाचार केस दर्ज करने का अधिकार: सुप्रीम कोर्ट ने SLP खारिज की
महिला ने पति की मां मंजू देवी, भाई शिवम कुमार और बहन रूपम देवी के खिलाफ भी आरोप लगाए। निचली अदालत ने भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 85, 115(2), 118(1), और 191(2) के तहत संज्ञान लेते हुए सभी के खिलाफ समन जारी कर दिया था। इसी आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।
याचिकाकर्ताओं की दलीलें
याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि शिकायत में लगाए गए आरोप बेहद सामान्य और बिना ठोस विवरण के हैं। किसी भी आरोपी के खिलाफ कोई स्पष्ट भूमिका या घटना नहीं बताई गई है। वकील ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि वैवाहिक विवादों में पति के पूरे परिवार को घसीट लेना कानून का दुरुपयोग है।
एक और अहम दलील यह थी कि शिकायतकर्ता की पहली शादी कानूनी रूप से खत्म नहीं हुई थी। तलाक का कोई आदेश रिकॉर्ड पर नहीं था। ऐसे में दूसरी शादी कानून की नजर में शून्य (void) है और उसी आधार पर वैवाहिक अपराध नहीं बनता।
Read also:- एक ही मामले में दोबारा टैक्स जांच नहीं: राधिका-प्रणय रॉय पर री-असेसमेंट नोटिस दिल्ली हाईकोर्ट ने रद्द किया
अदालत की टिप्पणी
अदालत ने शिकायत और जांच के रिकॉर्ड को ध्यान से देखने के बाद कहा कि पति के रिश्तेदारों पर लगाए गए आरोप “अस्पष्ट, सामूहिक और सामान्य” हैं। कोर्ट ने कहा,
“केवल व्यापक आरोपों के आधार पर किसी व्यक्ति को आपराधिक मुकदमे का सामना करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।”
हाईकोर्ट ने यह भी नोट किया कि शिकायतकर्ता पिछले तीन वर्षों से आरोपित रिश्तेदारों के साथ कभी नहीं रही। कोर्ट के अनुसार,
“क्रूरता का आरोप तभी संभव है जब साथ रहने या निकट संपर्क का कोई आधार हो।”
जहां तक गला दबाने के आरोप की बात है, कोर्ट ने पाया कि इसका कोई मेडिकल या स्वतंत्र सबूत नहीं है और यह आरोप बाद में जोड़ा गया प्रतीत होता है।
Read also:- 19 साल बाद उच्च पद की मांग नामंजूर: सुप्रीम कोर्ट ने कहा- अनुकंपा नियुक्ति स्वीकार करने के बाद अधिकार खत्म
सबसे महत्वपूर्ण टिप्पणी विवाह की वैधता को लेकर रही। अदालत ने कहा कि पहली शादी के रहते दूसरी शादी कानूनन शून्य है। कोर्ट ने स्पष्ट किया,
“वैध वैवाहिक संबंध के बिना वैवाहिक अपराध की नींव ही नहीं बनती।”
फैसला
इन सभी तथ्यों के आधार पर पटना हाईकोर्ट ने निचली अदालत के संज्ञान आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि इस तरह की कार्यवाही जारी रखना न्याय के साथ गंभीर अन्याय होगा।
इसके साथ ही सभी याचिकाकर्ताओं के खिलाफ आपराधिक मामला समाप्त कर दिया गया ।
Case Title: Manju Devi & Ors. v. State of Bihar & Anr.
Case Number: Criminal Miscellaneous No. 36935 of 2025










