गुजरात हाईकोर्ट ने एक संवेदनशील कस्टडी विवाद में अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि बच्चे का समग्र कल्याण सबसे ऊपर है। अदालत ने फैमिली कोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए मां की अपील खारिज कर दी और नाबालिग बेटे की कस्टडी पिता के पास ही रहने दी। साथ ही, मां को तय समय पर मिलने और वीडियो/ऑडियो कॉल की सुविधा जारी रखी गई।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला वर्ष 2015 में हुई शादी से जुड़ा है। दंपती के बीच मतभेद बढ़ने पर अक्टूबर 2022 में परंपरागत तलाक का एक समझौता हुआ, जिसमें नाबालिग बेटे की स्थायी कस्टडी पिता को दी गई थी और मां को सीमित मुलाकात के अधिकार मिले थे।
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करीब एक साल बाद मां ने फैमिली कोर्ट में आवेदन देकर स्थायी कस्टडी मांगी। फैमिली कोर्ट ने विस्तृत सुनवाई के बाद कस्टडी पिता के पास ही रखते हुए मां को हर महीने पहली और तीसरी रविवार को मिलने, सप्ताह में एक बार कॉल और जन्मदिन पर मुलाकात की अनुमति दी। इसी आदेश को चुनौती देते हुए मां हाईकोर्ट पहुंची थीं।
मां की दलीलें
मां की ओर से कहा गया कि
- वह पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चे की प्राकृतिक अभिभावक हैं।
- तलाक समझौता दबाव में कराया गया था और कानूनन अमान्य है।
- बच्चे का बेहतर भविष्य, शिक्षा और देखभाल मां के साथ संभव है क्योंकि उनकी आय और रहने की व्यवस्था बेहतर है।
वकील ने तर्क दिया कि पिता की नौकरी के लंबे समय के कारण बच्चे की देखभाल प्रभावित हो सकती है।
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पिता का पक्ष
पिता ने जवाब में कहा कि
- मां ने स्वेच्छा से तलाक समझौते में कस्टडी छोड़ने पर सहमति दी थी।
- बच्चा लंबे समय से पिता के साथ रह रहा है और स्कूल, पढ़ाई व अन्य गतिविधियों में अच्छा कर रहा है।
- परिवार के अन्य सदस्य भी बच्चे की देखभाल में सहयोग करते हैं।
उनका कहना था कि अचानक कस्टडी बदलना बच्चे के लिए नुकसानदेह होगा।
अदालत की अहम टिप्पणियां
गुजरात हाईकोर्ट की खंडपीठ न्यायमूर्ति संगीता के. विशेन और न्यायमूर्ति निशा एम. ठाकोर ने कहा कि कानून में मां को प्राथमिकता जरूर दी गई है, लेकिन यह अनिवार्य नहीं है।
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पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा,
“बच्चे का कल्याण सर्वोपरि है। जिस माहौल में वह सुरक्षित, संतुलित और खुश है, उसे अचानक बदलना उसके हित में नहीं होगा।”
अदालत ने यह भी नोट किया कि न्यायालय ने स्वयं बच्चे से बातचीत की और पाया कि वह पिता के साथ सहज और संतुलित है। स्कूल रिपोर्ट और रिकॉर्ड से भी बच्चे की अच्छी प्रगति सामने आई।
अंतिम फैसला
सभी तथ्यों और साक्ष्यों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने माना कि फैमिली कोर्ट का आदेश सही है और उसमें किसी तरह की कानूनी खामी नहीं है।
अदालत ने मां की अपील खारिज करते हुए कहा कि फिलहाल बच्चे की स्थायी कस्टडी पिता के पास ही रहेगी, जबकि मां को पहले से तय विशेष मुलाकात और संवाद के अधिकार मिलते रहेंगे।
Case Title: Mother (Appellant) vs Father (Respondent)
Case Number: R/First Appeal No. 2780 of 2025
Date of Judgment: December 9, 2025










