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शादी के वादे पर बने यौन संबंध को हर हाल में बलात्कार नहीं कहा जा सकता: कर्नाटक हाईकोर्ट ने FIR रद्द की

XXX बनाम कर्नाटक राज्य और अन्य - कर्नाटक उच्च न्यायालय ने बलात्कार की एफआईआर रद्द की, कहा कि विवाह के वादे पर सहमति से बना संबंध अपराध नहीं बन सकता यदि विवाह नहीं होता है।

Shivam Y.
शादी के वादे पर बने यौन संबंध को हर हाल में बलात्कार नहीं कहा जा सकता: कर्नाटक हाईकोर्ट ने FIR रद्द की

कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में साफ किया है कि लंबे समय तक सहमति से बने शारीरिक संबंध, केवल इसलिए बलात्कार नहीं बन जाते क्योंकि बाद में शादी नहीं हुई। अदालत ने इस मामले में दर्ज एफआईआर और आगे की आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला बेंगलुरु ग्रामीण जिले के बायादरहल्ली पुलिस थाने में दर्ज एक एफआईआर से जुड़ा था। शिकायतकर्ता महिला ने आरोप लगाया था कि एक अधिवक्ता ने शादी का वादा कर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए और बाद में विवाह से इनकार कर दिया। महिला ने यह भी कहा कि आरोपी के रिश्तेदारों ने उसे धमकाया।

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एफआईआर में भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की कई गंभीर धाराएं लगाई गई थीं, जिनमें बलात्कार से जुड़ा प्रावधान भी शामिल था। इसके बाद आरोपी और उसके रिश्तेदारों ने हाईकोर्ट का रुख कर एफआईआर रद्द करने की मांग की।

अदालत में सुनवाई

मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति एम. नागप्रसन्ना की पीठ ने की। याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि शिकायतकर्ता पहले से शादीशुदा रही है और दोनों के बीच संबंध लंबे समय तक आपसी सहमति से चले। ऐसे में इसे जबरन बनाया गया संबंध नहीं कहा जा सकता।

वहीं, शिकायतकर्ता की ओर से कहा गया कि शादी का भरोसा दिलाकर संबंध बनाए गए और बाद में आरोपी ने दूरी बना ली। राज्य सरकार ने भी जांच जारी रखने की मांग की।

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कोर्ट के अवलोकन

अदालत ने शिकायत और रिकॉर्ड पर मौजूद तथ्यों का विस्तार से अध्ययन किया। कोर्ट ने पाया कि शिकायतकर्ता और आरोपी के बीच लगभग दो वर्षों तक संबंध रहे और शिकायत में कहीं भी यह नहीं दिखता कि शुरू से ही शादी का वादा धोखे से किया गया था।

पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के कई पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि सहमति से बने संबंध और बलात्कार के बीच स्पष्ट अंतर है। अदालत ने टिप्पणी की,

“हर असफल संबंध को आपराधिक रंग देना कानून की मंशा नहीं है। सहमति से बना रिश्ता, केवल इसलिए अपराध नहीं बन जाता क्योंकि वह शादी तक नहीं पहुंचा।”

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कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि शुरुआत से ही धोखे की नीयत साबित न हो, तो ऐसे मामलों में आपराधिक मुकदमा चलाना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।

फैसला

इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए कर्नाटक हाईकोर्ट ने संबंधित एफआईआर और उससे जुड़ी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया।

अदालत ने कहा कि इस मामले में जांच या मुकदमा जारी रखना न्याय के हित में नहीं होगा।

Case Title:- XXX vs. The State of Karnataka & Anr.

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