बिलासपुर स्थित छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में एक पुराना लेकिन संवेदनशील पारिवारिक संपत्ति विवाद अपने अंतिम पड़ाव पर पहुँचा। अदालत के सामने सवाल सीधा था-क्या किसी महिला का तथाकथित ‘चूड़ी प्रथा’ से किया गया विवाह तब वैध माना जा सकता है, जब उसका पहला पति जीवित हो? अदालत ने साफ शब्दों में कहा, नहीं।
मामला कैसे शुरू हुआ
यह मामला बालोद जिले की कृषि भूमि से जुड़ा है। विवाद उस जमीन को लेकर था, जो एक व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसके वारिसों के बीच बँटवारे का विषय बनी। मृतक की पहली पत्नी के निधन के बाद, उसके साथ रहने वाली एक महिला और उसकी बेटियों ने खुद को वैध पत्नी और संतान बताते हुए संपत्ति में आधे हिस्से की माँग की।
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उनका दावा था कि महिला का विवाह मृतक से सामाजिक परंपरा ‘चूड़ी विवाह’ के तहत हुआ था और वह वर्षों तक उसके साथ पत्नी की तरह रही। इसी आधार पर ट्रायल कोर्ट के बाद प्रथम अपीलीय अदालत ने उन्हें उत्तराधिकारी मान लिया।
प्रथम अपीलीय अदालत ने माना कि गांव की परंपरा के अनुसार विवाह हुआ था, साथ रहने और समाज में स्वीकार्यता के आधार पर विवाह को वैध ठहराया गया। अदालत ने यह भी कहा कि महिला की मृत्यु मृतक के घर में हुई, जिससे वैवाहिक संबंध साबित होता है।
हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति बिभु दत्त गुरु ने पूरे रिकॉर्ड की दोबारा जाँच की। सुनवाई के दौरान अदालत ने खास तौर पर वादी पक्ष की गवाही पर ध्यान दिया। जज ने कहा,
“वादी स्वयं यह स्वीकार करती है कि कथित चूड़ी विवाह के समय उसकी माँ का पहला पति जीवित था।”
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अदालत ने स्पष्ट किया कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 5 और 11 के अनुसार, विवाह के समय दोनों पक्षों में से किसी का भी जीवित जीवनसाथी नहीं होना चाहिए। इसके विपरीत किया गया विवाह कानून की नजर में शुरू से ही शून्य होता है।
अदालत ने यह दलील भी खारिज कर दी कि किसी सामाजिक परंपरा के कारण ऐसा विवाह मान्य हो सकता है। न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि,
“कोई भी परंपरा, यदि वह कानून के विरुद्ध है, तो उसे मान्यता नहीं दी जा सकती।”
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल राजस्व रिकॉर्ड या साथ रहने से वैवाहिक अधिकार अपने आप पैदा नहीं होते।
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कोर्ट ने कहा कि जो पक्ष किसी विशेष परंपरा के आधार पर विवाह को वैध ठहराने की माँग करता है, उस पर यह साबित करने का भारी दायित्व होता है कि वह परंपरा स्पष्ट, लगातार और कानूनी रूप से मान्य है। इस मामले में ऐसा कोई ठोस प्रमाण पेश नहीं किया गया।
अंतिम फैसला
सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने निचली अपीलीय अदालत का फैसला रद्द कर दिया और ट्रायल कोर्ट का निर्णय बहाल कर दिया। अदालत ने माना कि कथित चूड़ी विवाह कानूनन शून्य है और ऐसे विवाह से संपत्ति में उत्तराधिकार का कोई अधिकार पैदा नहीं होता।
दूसरी अपील स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि विवादित संपत्ति पर दावा करने वाली पक्षकार कानूनी रूप से उत्तराधिकारी नहीं हैं।
मामले में किसी प्रकार की लागत (cost) नहीं लगाई गई।
Case Title: X v. Y
Case Number: Second Appeal No. 116 of 2005
Date Pronounced: 13 January 2026










