मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने वर्षों से लंबित एक सिविल मुकदमे में लगातार हो रही देरी को गंभीरता से लेते हुए ट्रायल कोर्ट का आदेश पलट दिया है। कोर्ट ने साफ कहा कि जब केवल अंतिम बहस और फैसला बाकी हो, तब भी अगर मामला सालों तक अटका रहे तो यह न्याय के साथ अन्याय है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला राजरखन सिंह बनाम राजकरन सिंह (अब दिवंगत, उनके कानूनी वारिसों के जरिए) से जुड़ा है। यह सिविल सूट जनवरी 2013 से लंबित था।
पिछले दो वर्षों से केस बार-बार अंतिम बहस के लिए सूचीबद्ध हो रहा था, लेकिन कभी कोर्ट के पास समय नहीं होने तो कभी अन्य कारणों से सुनवाई टलती रही।
स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि नवंबर 2025 में हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया था कि छह हफ्तों के भीतर अंतिम बहस सुनकर फैसला किया जाए। लेकिन इसके बावजूद, ट्रायल कोर्ट ने यह कहते हुए समय सीमा मानने से असमर्थता जताई कि उसके पास पर्याप्त न्यायिक समय नहीं है।
इसी आधार पर याचिकाकर्ताओं ने केस को दूसरे कोर्ट में ट्रांसफर करने की मांग की, जिसे पहले जिला न्यायाधीश ने खारिज कर दिया था।
कोर्ट की अहम टिप्पणियां
इस पूरे घटनाक्रम पर सुनवाई करते हुए जस्टिस विवेक जैन की पीठ ने ट्रायल कोर्ट के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई।
कोर्ट ने कहा कि जब हाईकोर्ट के स्पष्ट निर्देश मौजूद थे, तब भी अंतिम बहस को आगे बढ़ाने की कोई ठोस कोशिश नहीं की गई।
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पीठ ने टिप्पणी की,
“जब केवल अंतिम बहस और निर्णय बाकी हो, तब भी वर्षों तक मामला टालना न्यायिक अनुशासन पर सवाल खड़े करता है।”
कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे हालात में वादकारी के मन में यह भावना पैदा होती है कि न्याय व्यवस्था में अनुशासन और पदानुक्रम का सम्मान कमजोर पड़ रहा है।
ट्रायल कोर्ट के रवैये पर सवाल
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड देखते हुए पाया कि ट्रायल कोर्ट ने साफ तौर पर यह लिख दिया था कि वह छह हफ्तों में फैसला नहीं कर सकती।
इस पर अदालत ने कहा कि अगर वास्तविक कठिनाई थी, तो भी कम से कम निर्देशों के पालन की ईमानदार कोशिश तो की जानी चाहिए थी।
पीठ ने माना कि मामला लगभग 13 साल पुराना है और जब केवल अंतिम बहस शेष हो, तब इसे और लटकाना “न्याय में देरी” की श्रेणी में आता है।
हाईकोर्ट का फैसला
इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने जिला न्यायाधीश का 18 दिसंबर 2025 का आदेश रद्द कर दिया।
साथ ही, सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 24 के तहत केस को दूसरे सक्षम कोर्ट में ट्रांसफर करने की याचिका मंजूर कर ली।
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अदालत ने निर्देश दिया कि यह मामला अब ऐसे न्यायाधीश को सौंपा जाए, जिनके पास पर्याप्त न्यायिक समय हो, ताकि 13 साल पुराने इस मुकदमे में जल्द से जल्द अंतिम बहस सुनकर फैसला सुनाया जा सके।
कोर्ट ने कहा,
“न्याय के हित में यही उचित है कि यह मुकदमा अब ऐसे कोर्ट को सौंपा जाए, जो समय रहते इसे अंजाम तक पहुंचा सके।”
इसी के साथ याचिका का निपटारा कर दिया गया।
Case Title: Rajrakhan Singh vs Rajkaran Singh (Since Deceased) Through LRs
Case No.: Misc. Petition No. 51 of 2026
Decision Date: 13 January 2026










