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सुप्रीम कोर्ट ने फ्लैट नंबर 7 विवाद में हाईकोर्ट का आदेश पलटा, सोसायटी सदस्यता को दी कानूनी मान्यता

शशीन पटेल एवं अन्य। बनाम उदय दलाल एवं अन्य। सुप्रीम कोर्ट ने मुंबई के मालबोरो हाउस सोसायटी फ्लैट विवाद में हाईकोर्ट का आदेश पलटते हुए सदस्यता को वैध ठहराया।

Vivek G.
सुप्रीम कोर्ट ने फ्लैट नंबर 7 विवाद में हाईकोर्ट का आदेश पलटा, सोसायटी सदस्यता को दी कानूनी मान्यता

सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को मुंबई के पेडर रोड स्थित एक को-ऑपरेटिव हाउसिंग सोसायटी से जुड़े पुराने विवाद पर अहम फैसला सुनाया गया। मामला फ्लैट नंबर 7 की सदस्यता को लेकर था, जो करीब तीन दशक से अलग-अलग मंचों पर घूमता रहा। अदालत में मौजूद माहौल से साफ था कि यह सिर्फ एक फ्लैट का विवाद नहीं, बल्कि सोसायटी व्यवस्था और सदस्यों के अधिकारों का सवाल भी था।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद Supreme Court of India के सामने दो अपीलों के रूप में आया। अपीलकर्ता शशिन पटेल और भाविनी पटेल हैं, जो स्वर्गीय नरेंद्र पटेल के कानूनी उत्तराधिकारी हैं। नरेंद्र पटेल वर्षों से मालबोरो हाउस को-ऑपरेटिव हाउसिंग सोसायटी के फ्लैट नंबर 7 में किरायेदार थे।

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1990 के दशक में जब मूल मालिक कंपनी लिक्विडेशन में गई, तब सभी किरायेदारों ने मिलकर सोसायटी बनाई और संपत्ति अपने नाम करवाई। छह सदस्यों ने तय रकम जमा की, लेकिन नरेंद्र पटेल ने मांगी गई राशि के ब्योरे पर सवाल उठाते हुए भुगतान नहीं किया। सोसायटी का कहना था कि उन्होंने योगदान से इनकार किया, जबकि पटेल परिवार का दावा था कि वे भुगतान को तैयार थे, बस हिसाब स्पष्ट नहीं किया गया।

प्रशासनिक और कानूनी मोड़

साल 2025 में सोसायटी के भीतर प्रबंधन को लेकर विवाद बढ़ा। चुनाव न होने के चलते उप-निबंधक ने प्रशासक नियुक्त कर दिया। इसी दौरान पटेल परिवार ने सदस्यता के लिए औपचारिक आवेदन दिया और पूरी रकम चेक के साथ जमा की।

डिविजनल जॉइंट रजिस्ट्रार ने यह मानते हुए कि 2005 की आम बैठक में नरेंद्र पटेल को सदस्य बनाने का प्रस्ताव पारित हो चुका था, शशिन और भाविनी पटेल को सदस्य मान लिया।

हालांकि, इस आदेश को कुछ अन्य सदस्यों ने बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने रजिस्ट्रार के आदेश को रद्द करते हुए विशेष आम सभा बुलाने का निर्देश दिया।

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सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां

सुप्रीम कोर्ट ने रिकॉर्ड और दलीलों को देखने के बाद हाईकोर्ट के रुख से असहमति जताई। पीठ ने कहा कि,

“जब सोसायटी की आम बैठक में पहले ही सदस्यता को लेकर प्रस्ताव पारित हो चुका था और वह कभी रद्द नहीं हुआ, तो केवल देरी के आधार पर सदस्यता से इनकार उचित नहीं है।”

अदालत ने यह भी माना कि पटेल परिवार का फ्लैट पर कब्जा कभी अवैध नहीं बताया गया और न ही लंबे समय तक उन्हें बेदखल करने की कोई कार्रवाई हुई। ऐसे में उन्हें सदस्यता से वंचित रखना व्यावहारिक और न्यायसंगत नहीं होगा।

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अदालत का अंतिम फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के उस हिस्से को रद्द कर दिया, जिसमें पटेल परिवार की सदस्यता को निरस्त किया गया था। अदालत ने शशिन और भाविनी पटेल को सोसायटी का वैध सदस्य माना और उनके द्वारा फ्लैट की बिक्री के बाद नए खरीदार को दी गई सदस्यता को भी मान्यता दी।

हालांकि, कोर्ट ने यह छूट दी कि अगर सोसायटी के अन्य सदस्य चाहें तो देरी से भुगतान के लिए अतिरिक्त ब्याज या रकम तय कराने के लिए संबंधित प्राधिकरण के पास जा सकते हैं।

इसी के साथ दोनों अपीलों का निपटारा कर दिया गया।

Case Title: Shashin Patel & Anr. vs Uday Dalal & Ors.

Case No.: Civil Appeal arising out of SLP (Civil) Nos. 36106 & 36057 of 2025

Decision Date: 05 February 2026

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