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रियल एस्टेट खरीदारों को राहत: सुप्रीम कोर्ट ने ग्रैंड वेनेज़िया परियोजना में दिवालिया कार्यवाही को सही ठहराया

सतिंदर सिंह भासिन बनाम कर्नल गौतम मुल्लिक और अन्य - सुप्रीम कोर्ट ने ग्रैंड वेनेज़िया मामले में अपीलें खारिज कर दीं और कार्यालय इकाइयों को वितरित करने में विफल रहने के लिए रियल एस्टेट फर्मों के खिलाफ संयुक्त दिवालियापन को बरकरार रखा।

Vivek G.
रियल एस्टेट खरीदारों को राहत: सुप्रीम कोर्ट ने ग्रैंड वेनेज़िया परियोजना में दिवालिया कार्यवाही को सही ठहराया

नई दिल्ली की अदालत में माहौल गंभीर था। खरीदारों और डेवलपर के बीच वर्षों से चल रहा विवाद आखिरकार अपने निर्णायक मोड़ पर पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट ने दिवालियापन और शोधन अक्षमता संहिता, 2016 (IBC) के तहत ग्रैंड वेनेज़िया कमर्शियल टावर परियोजना से जुड़े मामले में साफ कहा कि जब फ्लैट या ऑफिस यूनिट समय पर तैयार न हों, तो खरीदारों का IBC की धारा 7 के तहत कार्यवाही शुरू करना पूरी तरह वैध है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला उत्तर प्रदेश के एक बड़े रियल एस्टेट प्रोजेक्ट से जुड़ा है, जिसे Bhasin Infotech and Infrastructure Pvt. Ltd. और Grand Venezia Commercial Towers Pvt. Ltd. ने मिलकर विकसित किया था।
141 से अधिक खरीदारों ने आरोप लगाया कि उन्होंने वर्षों पहले भुगतान कर दिया, लेकिन आज तक उन्हें न तो पूरी तरह तैयार यूनिट मिली और न ही कानूनी रूप से वैध कब्जा।

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खरीदारों का कहना था कि परियोजना के लिए आवश्यक फाइनल कंप्लीशन सर्टिफिकेट और ट्राइपारटाइट सब-लीज डीड कभी जारी ही नहीं की गई। डेवलपर्स की ओर से यह दलील दी गई कि निर्माण पूरा हो चुका है और कई खरीदारों को कब्जा भी दिया गया है।

निचली अदालतों का रुख

नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) ने खरीदारों की याचिका स्वीकार करते हुए दोनों कंपनियों के खिलाफ दिवालिया समाधान प्रक्रिया शुरू कर दी। इसके खिलाफ अपील में नेशनल कंपनी लॉ अपीलीय ट्रिब्यूनल (NCLAT) भी डेवलपर्स को राहत देने के लिए तैयार नहीं हुआ।

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सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणियां

सुप्रीम कोर्ट की पीठ न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन ने रिकॉर्ड पर मौजूद दस्तावेज़ों और निरीक्षण रिपोर्टों का हवाला देते हुए कहा:

“कागज़ों में दिए गए ‘कब्जा पत्र’ तब तक कोई कानूनी महत्व नहीं रखते, जब तक परियोजना सभी आवश्यक अनुमतियों के साथ पूरी न हो।”

अदालत ने यह भी साफ किया कि रियल एस्टेट खरीदार वित्तीय लेनदार माने जाते हैं और यदि तय समय पर यूनिट नहीं मिलती, तो यह स्पष्ट रूप से डिफॉल्ट है।

कोर्ट ने डेवलपर्स की उस दलील को भी खारिज कर दिया जिसमें कहा गया था कि 100 खरीदारों की न्यूनतम सीमा पूरी नहीं होती। पीठ ने दो टूक कहा:

“सीमा की गणना याचिका दाखिल करने की तारीख से होगी, बाद की समझौतों से इसका असर नहीं पड़ेगा।”

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एक अहम सवाल यह भी था कि क्या दो अलग-अलग कंपनियों के खिलाफ एक ही दिवालिया याचिका दाखिल हो सकती है। इस पर अदालत ने कहा कि जब दोनों कंपनियां एक ही परियोजना में गहराई से जुड़ी हों और खरीदारों के प्रति उनकी जिम्मेदारी साझा हो, तो संयुक्त कार्यवाही पूरी तरह वैध है।

अंतिम फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने NCLT और NCLAT के आदेशों में कोई गलती नहीं पाई। अदालत ने सभी अपीलें खारिज करते हुए कहा कि खरीदारों द्वारा शुरू की गई दिवालिया प्रक्रिया कानून के अनुरूप है।

इसके साथ ही एक पूर्व निदेशक द्वारा बाद में पैसे जमा करने की पेशकश को भी अदालत ने अस्वीकार कर दिया।

Case Title: Satinder Singh Bhasin vs. Col. Gautam Mullick & Others

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