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परंपरा से ऊपर संविधान: हाईकोर्ट ने कहा-गैर-पैतृक जमीन बेचने पर विधवा की सहमति पर्याप्त

मोहम्मद अशरफ और अन्य बनाम सादिक (मृतक) कानूनी वारिसों और अन्य के माध्यम से - पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि विधवा वारिसों की सहमति के बिना गैर-पैतृक संपत्ति बेच सकती है, दशकों पुराने फैसले को रद्द किया।

Shivam Y.
परंपरा से ऊपर संविधान: हाईकोर्ट ने कहा-गैर-पैतृक जमीन बेचने पर विधवा की सहमति पर्याप्त

चंडीगढ़ स्थित पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि संपत्ति गैर-पैतृक (self-acquired) हो, तो उस पर विधवा के अधिकारों को केवल परंपरागत रिवाजों के आधार पर सीमित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने निचली अदालतों के फैसले पलटते हुए 1982 की बिक्री को वैध ठहराया और संपत्ति पर दावा कर रहे रिश्तेदार का मुकदमा खारिज कर दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला गुड़गांव जिले की लगभग 42 कनाल 19 मरला जमीन से जुड़ा है। जमीन के मूल मालिक अक्कल की मृत्यु बिना संतान के हो गई थी। उनकी पत्नी रहमानी को संपत्ति मिली। बाद में रहमानी ने 4 जनवरी 1982 को यह जमीन बिक्री विलेख के जरिए अन्य पक्षों को बेच दी।

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अक्कल के रिश्तेदार ने इस बिक्री को चुनौती देते हुए दावा किया कि मेव समुदाय की परंपरा के अनुसार विधवा को केवल आजीवन अधिकार (life interest) मिलता है और वह रिश्तेदारों की सहमति के बिना संपत्ति नहीं बेच सकती। ट्रायल कोर्ट और पहली अपीलीय अदालत ने इस दलील को मानते हुए बिक्री रद्द कर दी थी।

हाईकोर्ट की सुनवाई और अहम सवाल

न्यायमूर्ति विरिंदर अग्रवाल की पीठ के सामने मुख्य सवाल यह था कि-

क्या गैर-पैतृक संपत्ति पर भी परंपरागत रिवाज (रिवाज-ए-आम) लागू होंगे, और क्या विधवा की बिक्री केवल इसलिए अमान्य मानी जा सकती है कि उसने रिश्तेदारों की सहमति नहीं ली?

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कोर्ट का अवलोकन

हाईकोर्ट ने विस्तार से सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों और संवैधानिक सिद्धांतों का हवाला दिया। अदालत ने कहा कि रिवाज-ए-आम में जिन “संपत्ति” का जिक्र होता है, वह आमतौर पर पैतृक संपत्ति तक सीमित होती है।

पीठ ने टिप्पणी की,

“जब संपत्ति को पहले ही गैर-पैतृक घोषित किया जा चुका है, तो केवल परंपरा के नाम पर विधवा के अधिकारों पर रोक लगाना कानूनी रूप से सही नहीं है।”

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कोर्ट ने यह भी माना कि रहमानी द्वारा की गई बिक्री व्यक्तिगत और वास्तविक जरूरतों जैसे परिवार से जुड़ी जिम्मेदारियों के लिए थी, और इसे अवैध नहीं ठहराया जा सकता।

फैसला

हाईकोर्ट ने निचली अदालतों के दोनों फैसले रद्द कर दिए। अदालत ने स्पष्ट किया कि गैर-पैतृक संपत्ति पर विधवा को पूर्ण अधिकार है और वह वैध जरूरतों के लिए उसे बेच सकती है। परिणामस्वरूप, रिश्तेदार द्वारा दायर मुकदमा खारिज कर दिया गया और 1982 का बिक्री विलेख बरकरार रखा गया।

Case Title: Mohd. Ashraf & Another v. Sadiq (Since Deceased) through LRs & Others

Case Number: RSA-1499-1996 (O&M)

Pronounced on: 22 January 2026

Advocates

  • For Appellants:
    • Mr. Ashish Aggarwal, Senior Advocate
    • Mr. Vishan Pundir, Advocate
  • For Respondents:
    • Mr. M.L. Sarin, Senior Advocate
    • Ms. Heman Sarin, Advocate

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