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सुप्रीम कोर्ट ने श्रम विवाद की राह नहीं रोकी, कहा– बिना डिमांड नोटिस भी हो सकती है सुलह प्रक्रिया

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बिना डिमांड नोटिस भी सुलह संभव है, प्रीमियम ट्रांसमिशन का श्रम विवाद जारी रहेगा।

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सुप्रीम कोर्ट ने श्रम विवाद की राह नहीं रोकी, कहा– बिना डिमांड नोटिस भी हो सकती है सुलह प्रक्रिया

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक अहम श्रम विवाद में दखल देने से इनकार करते हुए साफ कर दिया कि किसी कंपनी को औपचारिक डिमांड नोटिस दिए बिना भी सुलह (Conciliation) की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है।

न्यायालय ने प्रीमियम ट्रांसमिशन प्राइवेट लिमिटेड की अपील खारिज करते हुए महाराष्ट्र सरकार द्वारा भेजे गए श्रम विवाद के रेफरेंस को बरकरार रखा। अब यह मामला महाराष्ट्र के औद्योगिक न्यायालय में पूरी तरह सुना जाएगा।

यह मामला औरंगाबाद स्थित एक मैन्युफैक्चरिंग यूनिट में काम कर रहे ठेका मजदूरों से जुड़ा है। कंपनी ने सुप्रीम कोर्ट से मांग की थी कि औद्योगिक न्यायालय में चल रही कार्यवाही को रोका जाए, क्योंकि मजदूरों की यूनियन ने पहले कंपनी को कोई लिखित मांग पत्र नहीं दिया था।

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लेकिन कोर्ट ने माना कि कानून ऐसी कोई अनिवार्यता नहीं रखता।

प्रीमियम ट्रांसमिशन प्राइवेट लिमिटेड अपने कारखाने में ठेकेदारों के माध्यम से मजदूरों को काम पर रखती है।
2019 में मजदूरों की यूनियन ने आरोप लगाया कि ठेका व्यवस्था कागज़ी और दिखावटी है और असल में मजदूर कंपनी के ही नियंत्रण में स्थायी काम कर रहे हैं।

मजदूरों ने नियमितीकरण, समान वेतन और सेवा सुरक्षा की मांग उठाई। सुलह प्रक्रिया असफल होने के बाद, जनवरी 2020 में महाराष्ट्र सरकार ने विवाद को औद्योगिक न्यायालय भेज दिया।

कंपनी की ओर से दलील दी गई कि:

  • यूनियन ने पहले कंपनी के सामने कोई मांग नहीं रखी
  • इसलिए कोई “औद्योगिक विवाद” अस्तित्व में ही नहीं था
  • ठेका मजदूर कंपनी के कर्मचारी नहीं हैं

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वहीं यूनियन ने कहा कि अगर पहले ही कंपनी को मांग पत्र दिया जाता, तो मजदूरों की सेवाएं तुरंत समाप्त कर दी जातीं। यूनियन ने यह भी कहा कि कानून संभावित विवाद (apprehended dispute) में भी सुलह की अनुमति देता है।

न्यायमूर्ति एस. वी. एन. भट्टी ने फैसले में स्पष्ट कहा कि—

“औद्योगिक विवाद अधिनियम में यह कहीं नहीं लिखा है कि सुलह प्रक्रिया शुरू करने से पहले नियोक्ता को लिखित मांग देना अनिवार्य है।”

कोर्ट ने कहा कि जब कोई नियोक्ता खुद यह कहता है कि मजदूर उसके कर्मचारी नहीं हैं, तो यही असहमति अपने आप में विवाद को जन्म देती है।

न्यायालय ने यह भी चेतावनी दी कि तकनीकी आपत्तियों के जरिए सुलह और समाधान की प्रक्रिया को रोकना कानून की मंशा के खिलाफ है।

सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए कंपनी की अपील खारिज कर दी।

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कोर्ट ने औद्योगिक न्यायालय को निर्देश दिया कि वह दो मुख्य सवालों पर फैसला करे:

  1. क्या ठेका व्यवस्था वास्तव में दिखावटी (शाम) है
  2. क्या कंपनी इन मजदूरों की वास्तविक नियोक्ता है

औद्योगिक न्यायालय को यह मामला चार महीने के भीतर निपटाने को कहा गया है।

Case Title: M/s Premium Transmission Private Limited v. The State of Maharashtra & Others

Case Number: Civil Appeal No. ___ of 2026 (arising out of Special Leave Petition (Civil) No. 9970 of 2023)

Judgment Date: 27 January 2026

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