सुप्रीम कोर्ट में पश्चिम बंगाल सरकार और राज्य कर्मचारियों के बीच वर्षों से चल रहे महंगाई भत्ता (Dearness Allowance - DA) विवाद पर अहम फैसला आया। अदालत ने साफ कहा कि डीए केवल सरकारी कृपा नहीं बल्कि कर्मचारियों का कानूनी अधिकार है। कोर्ट ने राज्य सरकार को 2008 से 2019 तक के डीए बकाया का भुगतान करने का निर्देश दिया।
यह मामला राज्य कर्मचारियों द्वारा महंगाई के असर से वेतन घटने और डीए भुगतान में देरी को लेकर उठाया गया था।
मामले की पृष्ठभूमि
विवाद की शुरुआत तब हुई जब पश्चिम बंगाल सरकार ने 2009 में वेतन और भत्तों को संशोधित करने के लिए नियम बनाए। इन नियमों के तहत डीए को महंगाई के आधार पर तय किया जाना था।
कर्मचारियों का आरोप था कि सरकार ने कई बार डीए दरों में बदलाव किया, लेकिन 2010 से 2012 के बीच भुगतान में देरी हुई और कई मामलों में केंद्रीय कर्मचारियों की तुलना में कम दर पर डीए दिया गया।
कर्मचारी संगठनों ने तर्क दिया कि डीए वेतन का हिस्सा है और महंगाई से सुरक्षा के लिए जरूरी है। उन्होंने अदालत से मांग की कि बकाया डीए जारी किया जाए और भुगतान तय नियमों के अनुसार किया जाए।
दूसरी ओर, राज्य सरकार ने कहा कि डीए भुगतान वित्तीय संसाधनों पर निर्भर करता है और इसे केंद्रीय सरकार के बराबर देना अनिवार्य नहीं है।
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ट्रिब्यूनल और हाईकोर्ट की कार्यवाही
सबसे पहले मामला प्रशासनिक ट्रिब्यूनल पहुंचा, जहां कर्मचारियों की मांग खारिज कर दी गई। ट्रिब्यूनल ने कहा कि डीए देना सरकार का विवेकाधिकार है।
इसके बाद कर्मचारी हाईकोर्ट गए। हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल के फैसले को पलटते हुए कहा कि जब सरकार ने वेतन आयोग की सिफारिशें स्वीकार कर ली हैं, तब डीए भुगतान कर्मचारियों का कानूनी अधिकार बन जाता है।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि महंगाई का असर पूरे देश में होता है और क्षेत्र के आधार पर डीए में भेदभाव नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट में प्रमुख सवाल
सुप्रीम कोर्ट के सामने कई अहम मुद्दे थे, जिनमें शामिल थे:
- क्या डीए कर्मचारियों का कानूनी अधिकार है?
- क्या राज्य सरकार वित्तीय कठिनाई का हवाला देकर भुगतान रोक सकती है?
- क्या डीए केंद्रीय कर्मचारियों के समान देना अनिवार्य है?
- क्या डीए साल में दो बार देना जरूरी है?
कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियां
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने माना कि डीए का उद्देश्य महंगाई के कारण वेतन की वास्तविक कीमत घटने से कर्मचारियों को बचाना है। अदालत ने कहा कि जब नियमों में डीए को वेतन का हिस्सा माना गया है, तो इसका भुगतान अनिवार्य हो जाता है।
पीठ ने कहा, “डीए प्राप्त करना कर्मचारियों का कानूनी रूप से लागू किया जा सकने वाला अधिकार है।”
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि वित्तीय संकट कर्मचारियों के कानूनी अधिकार को खत्म नहीं कर सकता। अदालत ने कहा कि एक बार अधिकार स्थापित हो जाने के बाद राज्य सरकार वित्तीय तंगी का बहाना नहीं बना सकती।
हालांकि, अदालत ने यह मानने से इंकार किया कि कर्मचारियों को डीए साल में दो बार देना अनिवार्य है, क्योंकि संबंधित नियमों में इसकी बाध्यता नहीं है।
साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने यह प्रश्न खुला छोड़ दिया कि क्या डीए को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार माना जा सकता है।
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सुप्रीम कोर्ट का फैसला
अदालत ने राज्य सरकार की अपील आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए निम्न निर्देश दिए:
- पश्चिम बंगाल के कर्मचारियों को डीए प्राप्त करना कानूनी अधिकार है।
- डीए की गणना उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (AICPI) के आधार पर की जाएगी।
- कर्मचारियों को वर्ष 2008 से 2019 तक का डीए बकाया दिया जाएगा।
- अदालत ने पहले पारित अंतरिम आदेश का उल्लेख करते हुए कहा कि सरकार को बकाया राशि का कम से कम 25 प्रतिशत भुगतान करना होगा।
Case Title: State of West Bengal & Anr. vs Confederation of State Government Employees, West Bengal & Ors.
Case No.: Civil Appeal arising out of SLP (C) Nos. 22628-22630 of 2022 & Connected Matters
Decision Date: 06-Feb-2026










