इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में सोमवार को एक लंबी सुनवाई के बाद जाति आधारित राजनीतिक रैलियों पर दायर जनहित याचिका (PIL) का निपटारा कर दिया गया। याचिका में मांग की गई थी कि देशभर में राजनीतिक दलों द्वारा आयोजित जाति आधारित रैलियों और सम्मेलनों पर पूरी तरह रोक लगाई जाए।
मामले की पृष्ठभूमि
यह जनहित याचिका वर्ष 2013 में अधिवक्ता मोती लाल यादव ने दायर की थी। याचिका में कहा गया था कि राजनीतिक दल ब्राह्मण, यादव, क्षत्रिय, वैश्य जैसे जाति आधारित सम्मेलन आयोजित कर समाज को बांट रहे हैं। याचिकाकर्ता ने चुनाव आयोग से ऐसे आयोजनों पर रोक लगाने, जाति और धर्म के आधार पर वोट मांगने वालों को चुनाव लड़ने से रोकने और दोषी दलों का पंजीकरण रद्द करने की मांग की थी।
कोर्ट में क्या दलीलें रखी गईं
सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ओ.पी. श्रीवास्तव ने बताया कि चुनाव घोषित होने के बाद मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट (MCC) लागू हो जाता है, जिसमें जाति या धर्म के नाम पर वोट मांगने पर साफ रोक है। उन्होंने कहा कि ऐसे उल्लंघन पर एफआईआर, नोटिस, कड़ी चेतावनी, यहां तक कि पार्टी की मान्यता निलंबित करने तक की कार्रवाई का प्रावधान है।
कोर्ट को यह भी बताया गया कि यदि कोई उम्मीदवार जाति या धर्म के आधार पर वोट मांगता है तो यह जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के तहत “भ्रष्ट आचरण” माना जाता है, जिसे चुनाव याचिका के जरिए चुनौती दी जा सकती है।
कोर्ट की अहम टिप्पणियां
न्यायमूर्ति रजनीश राय और न्यायमूर्ति अभदेश कुमार चौधरी की पीठ ने कहा कि चुनाव के दौरान जाति आधारित राजनीति पर रोक के लिए पहले से ही पर्याप्त कानूनी प्रावधान मौजूद हैं। पीठ ने कहा,
“समस्या कानून की कमी नहीं, बल्कि उनके निष्पक्ष और प्रभावी क्रियान्वयन की है।”
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि उत्तर प्रदेश सरकार ने 21 सितंबर 2025 को एक सरकारी आदेश जारी कर राजनीतिक उद्देश्य से आयोजित जाति आधारित रैलियों पर प्रतिबंध लगा दिया है।
चुनाव आयोग की सीमाएं
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग के पास किसी राजनीतिक दल का पंजीकरण रद्द करने की सामान्य शक्ति नहीं है। इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले का हवाला देते हुए कहा गया कि केवल धोखाधड़ी या संविधान से निष्ठा खत्म करने जैसी असाधारण स्थितियों में ही ऐसा किया जा सकता है।
पीठ ने कहा कि किसी व्यक्ति या पार्टी को केवल समाज बांटने के आरोप में चुनाव लड़ने से रोकने का अधिकार फिलहाल कानून में नहीं है। ऐसी व्यवस्था लाने का काम केवल संसद कर सकती है।
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अंतिम निर्णय
सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने याचिका में मांगी गई राहतें देने से इनकार कर दिया और PIL को निस्तारित कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने उम्मीद जताई कि राज्य सरकार और चुनाव आयोग मौजूदा कानूनों को “अक्षरशः और प्रभावी ढंग से” लागू करेंगे।
Case Title: Moti Lal Yadav vs Chief Election Commissioner of India & Ors.
Case No.: PIL No. 5889 of 2013
Decision Date: 19 January 2026










