केरल हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में एक DrNB सुपर स्पेशियलिटी ट्रेनी डॉक्टर को बड़ी राहत दी है। अदालत ने कहा कि असाधारण हालात जैसे मातृत्व अवकाश और बाद में हुई गंभीर बीमारी को यांत्रिक तरीके से लागू नियमों के नीचे दबाया नहीं जा सकता। यह मामला W.P.(C) No. 48652 of 2025 से जुड़ा है, जिसमें न्यायमूर्ति बेच्चु कुरियन थॉमस ने 20 जनवरी 2026 को फैसला सुनाया। यह आदेश NBEMS के अवकाश नियमों की सख्त व्याख्या पर सवाल खड़ा करता है।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता सुसन के. जॉन ने MBBS और MD (जनरल मेडिसिन) के बाद NEET-SS 2022 के जरिए DrNB नेफ्रोलॉजी कोर्स जॉइन किया था। ट्रेनिंग के दौरान उन्होंने 2023 में 184 दिन का मातृत्व अवकाश लिया। इसके बाद उन्हें ‘स्टेज IV हाई ग्रेड बी-सेल लिम्फोमा’ जैसी गंभीर बीमारी हो गई और कीमोथेरेपी शुरू हुई। इलाज और रिकवरी के लिए उन्हें लंबा मेडिकल लीव लेना पड़ा।
NBEMS की 22 नवंबर 2024 की नई कॉम्प्रिहेन्सिव लीव गाइडलाइंस के मुताबिक, अगर ट्रेनिंग के दौरान कुल अवकाश एक साल से ज्यादा हो जाए तो कैंडिडेचर रद्द हो सकता है। बोर्ड ने कहा कि याचिकाकर्ता का कुल अवकाश 365 दिन से ऊपर जा रहा है, इसलिए उनका आवेदन मंजूर नहीं किया जा सकता। इसी वजह से उनके लीव आवेदन बार-बार लौटाए गए और चेतावनी दी गई कि सीमा पार होने पर रजिस्ट्रेशन रद्द हो सकता है।
कोर्ट की सुनवाई और प्रमुख तर्क
अदालत ने दोनों पक्षों को सुना। NBEMS ने दलील दी कि नियम स्पष्ट हैं और एक साल से ज्यादा अवकाश होने पर कैंडिडेचर खत्म हो सकता है। उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट के एक पुराने फैसले का भी हवाला दिया, जहां ज्यादा छुट्टी लेने वाले कैंडिडेट को राहत नहीं मिली थी।
लेकिन कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता ने कोर्स ऐसे समय जॉइन किया था, जब पुराने नियम लागू थे। उन पुराने नियमों में “लंबी बीमारी जैसे असाधारण मामलों” में अवकाश को क्लब करने की गुंजाइश थी। कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि मातृत्व अवकाश कोई साधारण छुट्टी नहीं है, बल्कि यह महिला का अधिकार है। आदेश में कहा गया, “मातृत्व अवकाश को अन्य सामान्य अवकाश के साथ जोड़कर एक ही तराजू में नहीं तौला जा सकता।”
न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का जिक्र करते हुए कहा कि मातृत्व लाभ महिलाओं की गरिमा, समानता और स्वास्थ्य से जुड़ा संवैधानिक अधिकार है। इसके अलावा, याचिकाकर्ता की बीमारी उनकी गलती नहीं थी और यह स्थिति उनके नियंत्रण से बाहर थी।
कोर्ट ने माना कि अकादमिक मामलों में आम तौर पर अदालतें दखल नहीं देतीं, लेकिन
“असाधारण हालात में असाधारण तरीका अपनाना पड़ता है।” जज ने कहा कि नए नियमों को इस मामले में सख्ती से लागू करना “गंभीर अन्याय” होगा। खास तौर पर, मातृत्व अवकाश को कुल अवकाश की सीमा गिनते समय शामिल नहीं किया जाना चाहिए।
फैसला
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को निर्देश दिया कि वह संस्थान के जरिए NBEMS को नया लीव आवेदन तय समय में दे। बोर्ड को कहा गया कि वह पुराने इनकार वाले पत्रों को नजरअंदाज करते हुए, मामले की खास परिस्थितियों को देखते हुए दो हफ्ते में नया फैसला ले। तब तक याचिकाकर्ता को DrNB प्रोग्राम से बाहर नहीं किया जाएगा। इसी के साथ याचिका का निपटारा कर दिया गया।
Case Title:- Susan K. John v. National Board of Examinations in Medical Sciences (NBEMS) & Others
Case Number:- W.P.(C) No. 48652 of 2025
Date of Judgment:- 20 January 2026










