सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक अहम सुनवाई के दौरान कड़ी नाराज़गी जताई। मामला एक अंडरट्रायल कैदी से जुड़ा था, जिसे तय 85 तारीखों में से 55 बार ट्रायल कोर्ट में पेश ही नहीं किया गया। अदालत ने साफ कहा कि ऐसी लापरवाही सीधे तौर पर आरोपी के संविधानिक अधिकारों पर असर डालती है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला शशिकुमार उर्फ शाही चिकना विवेकानंद जुमरानी से जुड़ा है, जो महाराष्ट्र में एक आपराधिक मुकदमे में अंडरट्रायल कैदी हैं। ट्रायल के दौरान लगातार उनकी गैर-पेशी की शिकायतें सामने आईं। इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट ने पहले एक आदेश पारित कर महाराष्ट्र के जेल और पुलिस प्रशासन से व्यक्तिगत रिपोर्ट मांगी थी।
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सोमवार को यह मामला उसी रिपोर्ट पर विचार के लिए सूचीबद्ध हुआ। रिपोर्ट अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (जेल एवं सुधार सेवा) द्वारा दाखिल की गई थी।
कोर्ट में क्या सामने आया
रिपोर्ट में बताया गया कि अधिकांश तारीखों पर आरोपी को अदालत में इसलिए नहीं लाया जा सका क्योंकि पुलिस एस्कॉर्ट उपलब्ध नहीं था। जेल प्रशासन की ओर से यह भी कहा गया कि कई बार वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेशी की अनुमति मांगी गई, लेकिन संबंधित अदालत से कोई आदेश नहीं मिला।
जब पीठ ने सवाल किया कि क्या उन्हीं दिनों किसी अन्य कैदी को अदालत में पेश किया गया था, तो जवाब मिला कि हर अदालत के लिए अलग-अलग एस्कॉर्ट भेजे जाते हैं। इस पर कोर्ट असहमत दिखी।
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कोर्ट की कड़ी टिप्पणी
न्यायमूर्ति अहसनुद्दीन अमानुल्लाह और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने कहा कि यह तर्क पहली नज़र में स्वीकार्य नहीं है।
पीठ ने टिप्पणी की,
“सबसे गंभीर बात यह है कि ऐसी लापरवाही का खामियाजा अंततः आरोपी को भुगतना पड़ता है। उसकी निष्पक्ष सुनवाई और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार प्रभावित होता है।”
अदालत ने साफ कहा कि कैदी को अदालत के सामने अपनी शिकायत रखने का अधिकार है - चाहे वह जेल में व्यवहार को लेकर हो या किसी अन्य समस्या को लेकर। यदि पेशी ही नहीं होगी, तो अदालत उस पर संज्ञान कैसे लेगी?
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जिम्मेदारी तय करने पर जोर
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि अक्सर पुलिस और जेल प्रशासन एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालकर बचने की कोशिश करते हैं, जिसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।
पीठ ने तीखे शब्दों में कहा,
“यह पूरी तरह अस्वीकार्य है कि हर अदालत के लिए अलग एस्कॉर्ट की बात कहकर संसाधनों की कमी का बहाना बनाया जाए। जरूरत पड़ने पर कैदियों को एक साथ ले जाकर कॉमन एस्कॉर्ट दिया जा सकता है। इसमें कोई कानून बाधा नहीं डालता।”
कोर्ट ने इसे पुलिस और जेल - दोनों स्तरों पर “पूर्ण लापरवाही” करार दिया।
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कोर्ट का आदेश
इन परिस्थितियों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने थाने के पुलिस आयुक्त, कल्याण जेल के अधीक्षक और अतिरिक्त वरिष्ठ जेलर (न्यायिक) को कारण बताओ नोटिस जारी किया। अदालत ने पूछा कि क्यों न उनके खिलाफ ड्यूटी में गंभीर लापरवाही के लिए कार्रवाई शुरू की जाए।
अदालत ने निर्देश दिया कि तीनों अधिकारी अगली तारीख पर व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हों और लिखित जवाब दाखिल करें।
मामले की अगली सुनवाई 24 फरवरी 2026 को तय की गई है, जिसे कोर्ट ने सूची में सबसे ऊपर रखने का आदेश दिया।
Case Title: Shashikumar @ Shahi Chikna Vivekanand Jumrani vs State of Maharashtra
Case No.: MA No. 183/2026 in SLP (Crl) No. 12690/2025
Decision Date: 03 February 2026










