दिल्ली की कड़कड़डूमा अदालत ने पशु कल्याण के नाम पर काम करने वाले संजय गांधी एनिमल केयर सेंटर (SGACC) के खिलाफ कड़ी टिप्पणी करते हुए उसकी याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि केंद्र ने बिना कानूनी अनुमति दस पालतू कुत्तों को अपने कब्जे में रखा और उन्हें तीसरे पक्ष को सौंप दिया।
यह आदेश 23 जनवरी 2026 को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश सुरभि शर्मा वत्स ने शाहदरा जिला अदालत में सुनाया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला जुलाई 2025 में दर्ज एक एफआईआर से शुरू हुआ, जिसमें कुत्तों के मालिक विशाल पर पशु क्रूरता का आरोप लगाया गया था। जांच के दौरान पुलिस ने उसके दस कुत्तों को जब्त कर SGACC को सौंप दिया।
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बाद में ट्रायल कोर्ट ने आदेश दिया कि कुत्तों की कस्टडी उनके मालिक को लौटाई जाए। SGACC ने इस आदेश को चुनौती देते हुए कहा कि अगर कुत्ते आरोपी को सौंपे गए, तो यह पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 की भावना के खिलाफ होगा।
दूसरी ओर, विशाल ने अदालत को बताया कि उसके कुत्तों को महीनों तक गैरकानूनी रूप से रखा गया, कुछ को बिना अनुमति गोद दे दिया गया और कुछ मादा कुत्तों की बिना सहमति सर्जरी तक कर दी गई।
अदालत की महत्वपूर्ण टिप्पणियां
अदालत ने रिकॉर्ड देखने के बाद पाया कि कुत्तों की जब्ती की प्रक्रिया ही कानून के अनुसार नहीं थी। न्यायालय ने कहा कि एनजीओ के सदस्य खुद पुलिस के साथ मौके पर पहुंचे, कुत्तों की जांच की और बिना किसी मजिस्ट्रेट या स्वतंत्र पशु चिकित्सक के आदेश के उन्हें अपने साथ ले गए।
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अदालत ने स्पष्ट कहा,
“पशु क्रूरता निवारण अधिनियम निजी एनजीओ को यह अधिकार नहीं देता कि वे स्वयं जांचकर्ता, डॉक्टर और संरक्षक की भूमिका निभाएं।”
न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि अधिनियम की धारा 34 के अनुसार जब्त किए गए पशुओं को मजिस्ट्रेट या अधिकृत पशु चिकित्सक के सामने पेश करना अनिवार्य है, जिसका पालन नहीं किया गया।
पशु कल्याण के दावे पर सवाल
अदालत ने यह भी कहा कि जब तक किसी व्यक्ति को दोषी साबित नहीं किया जाता, तब तक उसे निर्दोष माना जाएगा।
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“क्रूरता की धारणा मात्र अनुमान पर आधारित नहीं हो सकती, इसे कानून के अनुसार साबित करना होगा,” अदालत ने कहा।
न्यायालय ने बिना मालिक की अनुमति मादा कुत्तों की नसबंदी को नियमों का उल्लंघन बताया। एक कुत्ते की पूंछ काटे जाने पर अदालत ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा,
“पूंछ कोई बेकार वस्तु नहीं है, यह जीवित प्राणी का हिस्सा है। बिना सहमति इसे काटना हिंसा है, जिसे इलाज का नाम दिया जा रहा है।”
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अदालत का निर्णय
सभी तथ्यों और कानून के विश्लेषण के बाद अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि SGACC की कार्रवाई प्रक्रिया संबंधी खामियों, पक्षपात और अधिकारों के दुरुपयोग से ग्रस्त थी।
अदालत ने ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को सही ठहराया, जिसमें कुत्तों को उनके मालिक को तुरंत लौटाने का निर्देश दिया गया था। साथ ही, SGACC की याचिका खारिज करते हुए उस पर ₹2 लाख का जुर्माना लगाया गया, जिसे सरकारी पशु कल्याण कोष में जमा कराने का आदेश दिया गया।
अदालत ने स्पष्ट किया कि पशु कल्याण कानूनों का इस्तेमाल निजी संस्थाएं अपनी कानूनी सीमाओं से बाहर जाकर नहीं कर सकतीं।
Case Title: Sanjay Gandhi Animal Care Centre vs State & Another
Case Number: Criminal Revision No. 175/2025
Date of Decision: 23 January 2026










