श्रीनगर की अदालत में गुरुवार को माहौल गंभीर था। जस्टिस मोक्ष खजूरिया काज़मी की एकल पीठ के सामने बहुचर्चित फिल्म Article 370 से जुड़ा मामला लगा। याचिकाकर्ताओं ने निचली अदालत की कार्यवाही को चुनौती दी थी, और सुनवाई के दौरान अदालत ने आपराधिक प्रक्रिया के पालन पर अहम सवाल खड़े किए।
मामले की पृष्ठभूमि
मामले की जड़ एक शिकायत है, जो श्रीनगर के निवासी गुलाम मोहम्मद शाह ने दायर की थी। शिकायत में आरोप लगाया गया कि फिल्म Article 370 में उनकी तस्वीर का इस्तेमाल कर उन्हें कथित तौर पर “आतंकवादी” के रूप में दिखाया गया, जिससे उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा।
Read also:- सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: 1971 का भूमि-वेस्टिंग आदेश बहाल, राज्य सरकार की अपील मंजूर
इस शिकायत पर फॉरेस्ट मजिस्ट्रेट, श्रीनगर ने 30 दिसंबर 2025 को याचिकाकर्ताओं के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 356 के तहत पूर्व-संज्ञान (pre-cognizance) नोटिस जारी कर दिया।
फिल्म के निर्माता और अन्य याचिकाकर्ताओं ने इसी आदेश को जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख हाईकोर्ट में चुनौती दी।
याचिकाकर्ताओं की दलील
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने दलील दी कि मजिस्ट्रेट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 223 का पालन नहीं किया।
उनका कहना था कि:
- शिकायत दर्ज होने के बाद मजिस्ट्रेट का कर्तव्य था कि पहले शिकायतकर्ता और उसके गवाहों के बयान शपथ पर दर्ज किए जाते।
- इसके बाद ही आरोपी पक्ष को सुनवाई का अवसर दिया जा सकता था।
- रिकॉर्ड में ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे यह साबित हो कि शिकायतकर्ता या किसी गवाह का बयान दर्ज हुआ।
वरिष्ठ वकील ने इलाहाबाद और कर्नाटक हाईकोर्ट के हालिया फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि “बिना शपथ बयान के सीधे नोटिस जारी करना कानून के विपरीत है।”
Read also:- 'भगोड़ापन' का आरोप गलत था: राजस्थान उच्च न्यायालय ने सीआरपीएफ कांस्टेबल की बहाली का आदेश दिया
कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी
अदालत ने रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद साफ शब्दों में कहा कि प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ।
पीठ ने कहा,
“रिकॉर्ड से यह स्पष्ट है कि शिकायतकर्ता और गवाहों के बयान दर्ज किए बिना ही याचिकाकर्ताओं को नोटिस जारी कर दिया गया, जो BNSS में निर्धारित प्रक्रिया के खिलाफ है।”
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि जो नोटिस जारी किया गया, वह अधूरा था और उसमें आवश्यक विवरण तक भरे नहीं गए थे। अदालत ने इसे “न्यायिक मनन की कमी” का संकेत बताया।
कानूनी प्रक्रिया पर जोर
जस्टिस काज़मी ने दोहराया कि कानून में आरोपी को सुनवाई का अधिकार केवल औपचारिकता नहीं है। अदालत के शब्दों में,
“आरोपी को सुनवाई का अवसर तभी सार्थक होता है, जब उसे शिकायत, शपथ बयान और अन्य सामग्री उपलब्ध कराई जाए।”
अदालत का फैसला
इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने निचली अदालत के आदेश को प्रथम दृष्टया टिकाऊ नहीं माना।
अदालत ने:
- शिकायत से जुड़ी आगे की सभी कार्यवाहियों पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी।
- निचली अदालत का रिकॉर्ड वापस भेजने का निर्देश दिया।
- मामले को अगली तारीख पर सूचीबद्ध किया।
Case Title: Aditya Dhar & Ors. vs Ghulam Mohammad Shah
Case No.: CRM(M) No. 36/2026
Decision Date: 06 February 2026










