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नाबालिग की कस्टडी में बदलाव से इनकार, बोर्डिंग स्कूल भेजने की मांग खारिज: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने बच्चे की अभिरक्षा में बदलाव करने से इनकार कर दिया और अलग रह रहे माता-पिता के बीच लंबे समय से चल रहे विवाद में संशोधित मुलाक़ात के अधिकारों को बरकरार रखा।

Shivam Y.
नाबालिग की कस्टडी में बदलाव से इनकार, बोर्डिंग स्कूल भेजने की मांग खारिज: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने माता-पिता के बीच चल रहे कड़वे कानूनी विवाद में फंसे एक नाबालिग बच्चे की अभिरक्षा में बदलाव करने से इनकार कर दिया है और फैसला सुनाया है कि बच्चे की अभिरक्षा उसकी मां के पास ही रहेगी। हालांकि, न्यायालय ने मुलाक़ात के अधिकारों को लेकर बार-बार हुए विवादों की विस्तार से जांच की और एकल न्यायाधीश द्वारा पहले से ही लागू की गई संशोधित मुलाक़ात व्यवस्था को बरकरार रखा।

यह फैसला दोनों अभिभावकों द्वारा दायर की गई दो संबंधित विशेष अपीलों के बाद आया, जिनमें से प्रत्येक ने अपने बेटे से जुड़े बंदी प्रत्यक्षीकरण मामले में पारित एक ही आदेश के कुछ हिस्सों को चुनौती दी थी।

Background of the Case

डॉ. दिनेश कुमार अग्रवाल और दीप्ति गोयल का विवाह वर्ष 2017 में हुआ था। 2018 में उनके बेटे का जन्म हुआ। वैवाहिक विवादों के बाद मां बच्चे को लेकर लखनऊ आ गईं।

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वर्ष 2020 में पिता द्वारा बच्चे को कथित तौर पर मां की जानकारी के बिना अपने साथ ले जाने के बाद मामला अदालत तक पहुंचा। मां ने हैबियस कॉर्पस याचिका दायर की, जिसके बाद 6 जनवरी 2022 को हाईकोर्ट के आदेश से बच्चे की कस्टडी मां को सौंपी गई और पिता को मिलने (visitation) का अधिकार दिया गया।

इसके बाद भी दोनों पक्षों के बीच कई याचिकाएं, अवमानना कार्यवाही और संशोधन आवेदन दाखिल होते रहे।

Court Observations

मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति जसप्रीत सिंह की पीठ ने सुनवाई के दौरान बार-बार इस बात पर जोर दिया कि:

“अदालत का प्राथमिक कर्तव्य बच्चे के सर्वोत्तम हित की रक्षा करना है, न कि माता-पिता के आपसी विवाद का निपटारा करना।”

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अदालत ने रिकॉर्ड पर उपलब्ध तथ्यों के आधार पर कहा कि:

  • बच्चे की वर्तमान कस्टडी मां के पास कानूनी और वैध है।
  • पिता द्वारा कस्टडी बदलने के लिए कोई तत्काल और असाधारण परिस्थिति सामने नहीं आई।
  • बोर्डिंग स्कूल भेजने जैसी मांग बिना किसी मनोवैज्ञानिक या विशेषज्ञ रिपोर्ट के स्वीकार नहीं की जा सकती।

पीठ ने यह भी टिप्पणी की कि माता-पिता के बीच संघर्ष में बच्चे को “हथियार” नहीं बनाया जा सकता।

पिता की यह दलील थी कि बोर्डिंग स्कूल में पढ़ाई से बच्चे का समग्र विकास बेहतर होगा। इस पर अदालत ने साफ कहा:

“बोर्डिंग स्कूल भेजना कोई सार्वभौमिक समाधान नहीं है। यह निर्णय बच्चे की मानसिक और भावनात्मक स्थिति को परखे बिना नहीं लिया जा सकता।”

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अदालत ने माना कि बच्चा वर्तमान स्कूल और माहौल में सहज है, और इस स्तर पर उसे मां से अलग करना उसके हित में नहीं होगा।

Final Decision

सभी दलीलों और रिकॉर्ड के अवलोकन के बाद हाईकोर्ट ने:

  • नाबालिग की कस्टडी बदलने से इनकार किया,
  • बोर्डिंग स्कूल भेजने की मांग खारिज की,
  • यह स्पष्ट किया कि कस्टडी और भविष्य से जुड़े सभी मुद्दे फैमिली कोर्ट, लखनऊ में लंबित कार्यवाही में साक्ष्यों के आधार पर तय किए जाएंगे।

अदालत ने यह भी कहा कि उसका यह आदेश फैमिली कोर्ट को स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने से नहीं रोकेगा।

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