सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षा के अधिकार को ज़मीन पर उतारने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। मंगलवार को अदालत ने साफ कहा कि समाज के कमजोर और वंचित वर्ग के बच्चों को निजी स्कूलों में मुफ्त शिक्षा दिलाना सिर्फ कागज़ी प्रावधान नहीं, बल्कि एक “राष्ट्रीय मिशन” है।
मामले की पृष्ठभूमि
मामला बॉम्बे हाईकोर्ट के उस आदेश से जुड़ा है, जिसमें एक अभिभावक की याचिका खारिज कर दी गई थी। उन्होंने अपने बच्चों को निजी स्कूल में 25% मुफ्त कोटे के तहत दाखिला दिलाने की मांग की थी। हाईकोर्ट ने कहा था कि ऑनलाइन प्रक्रिया के दौरान उन्होंने समय पर आवेदन नहीं किया, इसलिए जिम्मेदारी उनकी ही बनती है।
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इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां शिक्षा के अधिकार कानून, 2009 की धारा 12(1)(c) की सही व्याख्या पर बहस हुई।
अदालत का अवलोकन
जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस ए.एस. चंदुरकर की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि कमजोर वर्ग के बच्चों को 25% आरक्षण के तहत दाखिला देना समाज की संरचना बदलने की ताकत रखता है।
पीठ ने टिप्पणी की,“इस प्रावधान का ईमानदारी से पालन न सिर्फ युवा भारत को शिक्षित करेगा, बल्कि बराबरी के संवैधानिक लक्ष्य को भी मजबूत करेगा।”
अदालत ने यह भी साफ किया कि यह जिम्मेदारी सिर्फ अभिभावकों पर नहीं छोड़ी जा सकती। राज्य सरकारें, स्थानीय प्रशासन और स्कूल-तीनों पर समान रूप से यह दायित्व है कि किसी बच्चे को उसके अधिकार से वंचित न किया जाए।
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फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि पड़ोस के सभी स्कूल-चाहे सरकारी हों या निजी-यह सुनिश्चित करें कि वंचित वर्ग के बच्चों को 25% सीटों पर अनिवार्य रूप से दाखिला मिले।
अदालत ने कहा, “ऐसे बच्चों को प्रवेश दिलाना सरकारों और स्थानीय निकायों का कर्तव्य ही नहीं, एक राष्ट्रीय मिशन होना चाहिए।”
कोर्ट ने राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) को भी इस मामले में पक्षकार बनाते हुए उससे हलफनामा दाखिल करने को कहा है। साथ ही, आदेश के पालन की निगरानी के लिए मामला लंबित रखा गया है।
Case Title: Dinesh Biwaji Ashtikar v. State of Maharashtra & Ors.
Case No.: SLP(C) No. 10105/2017
Decision Date: 13 January 2026










