सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण कानूनों के उल्लंघन से जुड़े एक अहम मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ कर दिया कि पर्यावरणीय नुकसान के मामलों में केवल तकनीकी दलीलें नहीं, बल्कि प्रोजेक्ट के प्रभाव और पैमाने को देखा जाएगा।
यह फैसला पुणे स्थित दो रियल एस्टेट परियोजनाओं - Rhythm County और Keystone Properties - से जुड़े मामलों में आया है, जिन पर बिना जरूरी पर्यावरणीय मंजूरी के निर्माण करने का आरोप था।
Read also:- सुप्रीम कोर्ट ने भूमि मुआवजा बहाल किया, कहा– कुछ मामलों की वजह से पूरी अवॉर्ड रद्द नहीं हो सकती
मामले की पृष्ठभूमि | क्या था विवाद
- Rhythm County परियोजना पर आरोप था कि उसने बिना वैध पर्यावरणीय अनुमति (EC) और प्रदूषण नियंत्रण स्वीकृति के निर्माण किया।
- Keystone Properties ने भी कथित रूप से बिना जरूरी मंजूरी के निर्माण कार्य शुरू किया और बाद में “पोस्ट-फैक्टो” अनुमति ली।
दोनों मामलों में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने भारी पर्यावरणीय मुआवजा लगाया था, जिसे बिल्डरों ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
NGT ने पाया कि:
- निर्माण कार्य पर्यावरणीय नियमों का उल्लंघन कर किया गया।
- प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की अनुमति के बिना काम चलता रहा।
- कुछ जगहों पर स्टॉप वर्क नोटिस के बावजूद निर्माण जारी रहा।
इसके आधार पर:
- Rhythm County पर ₹5 करोड़
- Keystone Properties पर ₹4.47 करोड़
का पर्यावरणीय मुआवजा लगाया गया।
Read also:- परंपरा से ऊपर संविधान: हाईकोर्ट ने कहा-गैर-पैतृक जमीन बेचने पर विधवा की सहमति पर्याप्त
सुप्रीम कोर्ट में बिल्डरों की दलील
डेवलपर्स ने दलील दी कि:
- मुआवजे की कोई तय कानूनी गणना नहीं है।
- CPCB (केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड) का फॉर्मूला रिहायशी प्रोजेक्ट्स पर लागू नहीं होता।
- केवल नियमों का उल्लंघन होना “पर्यावरणीय नुकसान” साबित नहीं करता।
उनका कहना था कि NGT ने बिना ठोस आधार के भारी जुर्माना लगाया।
सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी
न्यायमूर्ति दिपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की पीठ ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा:
“पर्यावरण कानून केवल कागज़ी औपचारिकता नहीं है।
जो परियोजना जितनी बड़ी होगी, उसकी जिम्मेदारी भी उतनी ही अधिक होगी।”
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि:
- ‘Polluter Pays Principle’ यानी प्रदूषक ही भुगतान करेगा पूरी तरह लागू होगा।
- प्रोजेक्ट की लागत, उसका आकार और पर्यावरण पर असर – ये सभी मुआवजे तय करने के वैध आधार हैं।
- NGT को मुआवजा तय करने के लिए किसी तय फॉर्मूले का इंतजार करने की जरूरत नहीं।
कोर्ट ने क्या कहा CPCB फॉर्मूले पर
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि:
- CPCB का फॉर्मूला बाध्यकारी नहीं है,
- लेकिन NGT उसे मार्गदर्शन के रूप में इस्तेमाल कर सकता है,
- और ज़रूरत पड़ने पर परियोजना लागत के आधार पर मुआवजा तय कर सकता है।
Read alos:- सुप्रीम कोर्ट ने श्रम विवाद की राह नहीं रोकी, कहा– बिना डिमांड नोटिस भी हो सकती है सुलह प्रक्रिया
कोर्ट ने कहा:
“पर्यावरणीय क्षति का मूल्यांकन गणितीय फार्मूले से नहीं, बल्कि व्यावहारिक असर से किया जाना चाहिए।”
अंतिम फैसला
- दोनों बिल्डरों की अपील खारिज
- NGT द्वारा लगाया गया मुआवजा बरकरार
- भुगतान के लिए 3 महीने की अतिरिक्त समय-सीमा
- पर्यावरण कानूनों के सख्त पालन का स्पष्ट संदेश
कोर्ट ने कहा कि:
“बड़े प्रोजेक्ट्स को पर्यावरणीय जिम्मेदारी से छूट नहीं दी जा सकती।”
Case Title: M/s Rhythm County v. Satish Hegde & Ors.
Case No.: Civil Appeal No. 7187 & 7974 of 2022
Decision Date: 30 January 2026










