पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने के नाम पर रिश्वत मांगने के गंभीर आरोपों का सामना कर रहे एक वरिष्ठ वकील को नियमित जमानत देने से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि ऐसे आरोप केवल व्यक्तिगत अपराध नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था की साख पर सीधा प्रहार हैं।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला सीबीआई द्वारा दर्ज एक एफआईआर से जुड़ा है, जिसमें शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि आरोपी वकील ने बठिंडा की एक पारिवारिक अदालत में लंबित तलाक मामले में अनुकूल आदेश दिलाने के लिए ₹30 लाख रुपये की अवैध मांग की। शिकायत के अनुसार, वकील ने यह राशि एक न्यायिक अधिकारी पर कथित प्रभाव का दावा करते हुए मांगी थी।
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केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने दो दिनों तक रिकॉर्ड की गई फोन बातचीत के माध्यम से शिकायत की पुष्टि की। सत्यापन के बाद, 14 अगस्त 2025 को भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 61(2) और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 7A के तहत एफआईआर दर्ज की गई।
उसी दिन जाल बिछाया गया। ऑपरेशन के दौरान, एक सह-आरोपी ने कथित तौर पर मांगी गई रिश्वत के आंशिक भुगतान के रूप में ₹4 लाख स्वीकार किए। याचिकाकर्ता को उसी दिन गिरफ्तार कर लिया गया और तब से वह न्यायिक हिरासत में है।
आरोपी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने दलील दी कि यह रकम रिश्वत नहीं, बल्कि पेशेवर फीस थी। उन्होंने कहा कि आरोपी न तो कोई लोक सेवक है और न ही वह स्वयं कोई न्यायिक आदेश पारित करने की स्थिति में था। यह भी तर्क दिया गया कि आरोपी की उम्र लगभग 70 वर्ष है और वह गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से पीड़ित है, इसलिए उसे जमानत दी जानी चाहिए।
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सीबीआई ने जमानत याचिका का कड़ा विरोध किया। एजेंसी ने कहा कि आरोपी एक अधिवक्ता होने के नाते न्यायालय का अधिकारी माना जाता है और यदि वही व्यक्ति न्यायिक प्रभाव का दावा कर रिश्वत मांगे, तो यह अपराध और भी गंभीर हो जाता है। सीबीआई ने रिकॉर्ड की गई बातचीत, सत्यापन रिपोर्ट और ट्रैप की कार्रवाई का हवाला देते हुए कहा कि प्रथम दृष्टया अवैध मांग और स्वीकार्यता के पर्याप्त साक्ष्य मौजूद हैं।
अदालत की टिप्पणियां
न्यायमूर्ति सुमीत गोयल ने अपने आदेश में कहा,
“भ्रष्टाचार न्याय के मूल स्तंभों को खोखला करता है। जब न्यायपालिका पर प्रभाव डालने के नाम पर धन की मांग की जाती है, तो यह केवल एक व्यक्ति के साथ धोखा नहीं, बल्कि संस्था के प्रति गंभीर अपराध है।”
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कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम केवल लोक सेवकों तक सीमित नहीं है, बल्कि उन व्यक्तियों पर भी लागू होता है जो अवैध तरीकों से किसी लोक सेवक को प्रभावित करने के लिए लाभ लेते या देते हैं।
अदालत का फैसला
सभी तथ्यों, रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री और आरोपों की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने नियमित जमानत देने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि आरोपी की उम्र, पेशेवर हैसियत या जांच पूरी हो जाने जैसे पहलू इस स्तर पर जमानत के लिए पर्याप्त नहीं हैं।
हालांकि, अदालत ने यह स्वतंत्रता दी कि शिकायतकर्ता और पीड़ित गवाहों के बयान दर्ज होने के बाद आरोपी निचली अदालत में दोबारा जमानत के लिए आवेदन कर सकता है।
Case Title: Jatin Salwan v. Central Bureau of Investigation
Case Number: CRM-M-51882-2025
Decision Date: 02 February 2026










