दिल्ली हाईकोर्ट ने एक ऐसे मामले में दोषसिद्धि को बरकरार रखा है, जिसमें एक पिता को अपनी नाबालिग बेटी के साथ गंभीर अपराध का दोषी ठहराया गया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब वैज्ञानिक साक्ष्य मजबूत हों, तो पारिवारिक गवाहों के बयानों में विरोधाभास होने के बावजूद उन्हें नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस मधु जैन की खंडपीठ ने दोषी की ओर से दायर आपराधिक अपील और सजा निलंबन की मांग को खारिज कर दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला जुलाई 2021 में जहांगीरपुरी थाना क्षेत्र में दर्ज एक एफआईआर(FIR) से जुड़ा है। एक नाबालिग लड़की के चिकित्सकीय परीक्षण के दौरान गर्भावस्था की पुष्टि होने के बाद पुलिस को सूचना दी गई थी। इसके बाद भारतीय दंड संहिता और पॉक्सो अधिनियम के तहत जांच शुरू की गई।
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जांच के दौरान कानून के अनुसार चिकित्सकीय प्रक्रियाएं अपनाई गईं और जैविक नमूनों को फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL) भेजा गया। ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों के आधार पर आरोपी, जो बच्ची का पिता था, को दोषी ठहराते हुए कठोर कारावास की सजा सुनाई।
ट्रायल के दौरान अभियोजन पक्ष ने बच्ची, उसकी मां, पुलिस अधिकारियों और फॉरेंसिक विशेषज्ञों सहित कई गवाह पेश किए। बाद के चरणों में बच्ची और उसकी मां ने अभियोजन का पूरी तरह समर्थन नहीं किया।
हालांकि, अदालत ने यह माना कि घरेलू परिस्थितियां, भय और निर्भरता के कारण नाबालिग लंबे समय तक चुप रही, जिसे पूरी तरह अस्वाभाविक नहीं कहा जा सकता।
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मामले में निर्णायक भूमिका फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी की डीएनए रिपोर्ट ने निभाई। रिपोर्ट में जैविक संबंध की पुष्टि हुई, जिसे अदालत ने अत्यंत विश्वसनीय माना।
फॉरेंसिक विशेषज्ञ ने अदालत में बयान देते हुए कहा कि जांच प्रक्रिया वैज्ञानिक मानकों के अनुसार की गई और परिणाम पूरी तरह भरोसेमंद हैं।
अपीलकर्ता की ओर से कहा गया कि जांच में कुछ प्रक्रियात्मक कमियां थीं, जैसे नमूनों को प्रयोगशाला भेजने में देरी और कुछ गवाहों की जांच न होना। यह भी तर्क दिया गया कि गवाहों के विरोधाभासी बयानों से अभियोजन का मामला कमजोर हो जाता है।
वहीं राज्य सरकार ने दलील दी कि वैज्ञानिक साक्ष्य स्वतंत्र और निर्णायक होते हैं तथा सामाजिक और आर्थिक दबाव के कारण ऐसे मामलों में गवाहों का पलटना असामान्य नहीं है।
अदालत की टिप्पणियां
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि बच्चों से जुड़े मामलों में पारिवारिक दबाव और परिस्थितियां जटिल हो सकती हैं, लेकिन ठोस वैज्ञानिक साक्ष्यों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
पीठ ने कहा कि डीएनए जांच एक विश्वसनीय वैज्ञानिक विधि है और पॉक्सो अधिनियम के तहत आवश्यक तथ्यों के सिद्ध होने पर वैधानिक अनुमान लागू होता है।
फैसला
अदालत ने यह निष्कर्ष निकाला कि ट्रायल कोर्ट के फैसले में कोई कानूनी या तथ्यात्मक त्रुटि नहीं है। इसी के साथ हाईकोर्ट ने अपील खारिज करते हुए सजा को बरकरार रखा और आदेश की प्रति जेल प्रशासन को भेजने का निर्देश दिया।
Case Title:- Dry v. State NCT of Delhi










