मदुरै बेंच, मद्रास हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान माहौल गंभीर था। अदालत एक ऐसे मामले पर विचार कर रही थी, जिसमें एक युवक पर शादी का झूठा वादा कर शारीरिक संबंध बनाने का आरोप है। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि ऐसे मामलों को हल्के में नहीं लिया जा सकता और आरोपी को अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता प्रभाकरण ने पुलिस द्वारा संभावित गिरफ्तारी से बचने के लिए अग्रिम जमानत की मांग की थी। उसके खिलाफ त्रिची जिले के मणप्पाराई स्थित ऑल वुमन पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर में धोखाधड़ी, आपराधिक धमकी और अन्य आरोप लगाए गए थे।
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शिकायतकर्ता, जो एक नर्सिंग डिप्लोमा धारक है, ने आरोप लगाया कि दोनों के बीच लंबे समय से प्रेम संबंध था। युवक ने शादी का भरोसा दिलाकर कई बार शारीरिक संबंध बनाए। बाद में, परिवार के दबाव और अन्य कारणों का हवाला देते हुए उसने शादी से इनकार कर दिया। शिकायत में यह भी कहा गया कि दोनों एक समय साथ रहने लगे थे और पुलिस के सामने भी युवक ने शादी का आश्वासन दिया था, जो बाद में पूरा नहीं हुआ।
याचिकाकर्ता की दलील
याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि शिकायत झूठी और मनगढ़ंत है। उसके वकील ने दलील दी कि दोनों बालिग थे और आपसी सहमति से रिश्ते में थे। याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि वह बेरोजगार है और रेलवे परीक्षा की तैयारी कर रहा है, ऐसे में शादी का दबाव उस पर और उसके परिवार पर मानसिक बोझ डालेगा।
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राज्य और शिकायतकर्ता का पक्ष
सरकारी वकील ने अग्रिम जमानत का कड़ा विरोध किया। उनका कहना था कि यह केवल प्रेम संबंध का मामला नहीं है, बल्कि शादी के झूठे वादे के जरिए महिला को धोखे में रखकर शारीरिक संबंध बनाने का गंभीर आरोप है।
शिकायतकर्ता के वकील ने भी अदालत का ध्यान इस ओर दिलाया कि आरोपी नेपहले शादी का भरोसा दिया और बाद में साफ इनकार कर दिया।
अदालत की टिप्पणियां
न्यायमूर्ति एस. श्रीमथी ने सुनवाई के दौरान विस्तृत टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि नए भारतीय न्याय संहिता (BNS) में धारा 69 विशेष रूप से ऐसे मामलों के लिए लाई गई है, जहां शादी का झूठा वादा कर महिला के साथ शारीरिक संबंध बनाए जाते हैं।
अदालत ने कहा,
“यदि प्रारंभ से ही शादी करने की मंशा नहीं थी और फिर भी वादा कर संबंध बनाए गए, तो यह धोखे की श्रेणी में आता है।”
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि पहले इस तरह के मामलों को बलात्कार या धोखाधड़ी की धाराओं में देखा जाता था, लेकिन अब BNS ने स्पष्ट प्रावधान कर दिया है। अदालत ने पुलिस को निर्देश दिया कि एफआईआर में धारा 69 BNS को भी जोड़ा जाए।
लाइव-इन संबंधों पर अदालत की दृष्टि
सुनवाई के दौरान अदालत ने व्यापक सामाजिक संदर्भ पर भी टिप्पणी की। न्यायालय ने कहा कि लाइव-इन संबंधों में महिलाएं अक्सर कानूनी संरक्षण से वंचित रह जाती हैं।
अदालत के शब्दों में,
“जब रिश्ता टूटता है, तो महिला मानसिक और सामाजिक रूप से अधिक असुरक्षित स्थिति में होती है।”
अदालत ने यह भी कहा कि यदि विवाह संभव नहीं है, तो कानून को ऐसे मामलों में महिला की सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी।
कोर्ट का निर्णय
सभी तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार करते हुए अदालत ने कहा कि मामले में प्रथम दृष्टया सबूत मौजूद हैं और आरोपी से पूछताछ आवश्यक है। इसलिए इस चरण पर अग्रिम जमानत नहीं दी जा सकती।
अदालत ने याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि आरोपी को कानून के अनुसार जांच का सामना करना होगा ।










