एक संवेदनशील और लंबे समय से उलझे कानूनी सवाल पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने स्पष्ट रुख अपनाया है। अदालत ने कहा कि जब किसी दत्तक बच्चे के जैविक माता-पिता और उनकी जाति अज्ञात हों, तो वैध गोद लेने के बाद उस बच्चे की जाति दत्तक माता-पिता की ही मानी जाएगी। यह फैसला उन मामलों में खास महत्व रखता है, जहां गोद लिए गए बच्चों को आरक्षण से जुड़े अधिकारों के लिए संघर्ष करना पड़ता है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला पुणे की गीता दत्तात्रय आचारी से जुड़ा है, जिन्होंने एक परित्यक्त बच्चे को वैधानिक प्रक्रिया के तहत गोद लिया था। जिला अदालत ने 2014 में दत्तक प्रक्रिया को मंजूरी दी और नगर निगम को बच्चे के नाम से जन्म प्रमाण पत्र जारी करने का निर्देश दिया। बच्चे का नाम ओम दत्तात्रय आचारी रखा गया। गीता आचारी स्वयं विशेष पिछड़ा वर्ग (Special Backward Category) से हैं। इसी आधार पर 2017 में उपजिलाधिकारी ने ओम को जाति प्रमाण पत्र जारी किया।
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हालांकि, एक गुमनाम शिकायत के बाद जांच हुई और 2018 में यह प्रमाण पत्र रद्द कर दिया गया। जाति छानबीन समिति ने भी अपील खारिज कर दी। इसके बाद यह मामला हाईकोर्ट पहुंचा।
अदालत की टिप्पणियां
सुनवाई के दौरान पीठ न्यायमूर्ति एस.एम. मोदक और न्यायमूर्ति एम.एस. कर्णिक ने साफ कहा कि इस तरह के मामलों में केवल जाति प्रमाण पत्र कानून को अलग-थलग देखकर फैसला नहीं किया जा सकता। अदालत ने किशोर न्याय (देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2000 के प्रावधानों को भी साथ-साथ पढ़ने की जरूरत बताई।
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पीठ ने टिप्पणी की,
“जब गोद लेने की प्रक्रिया पूरी हो जाती है, तो बच्चा दत्तक माता-पिता का वैध संतान बन जाता है, और उससे जुड़े सभी अधिकार उसे मिलते हैं।”
अदालत ने यह भी कहा कि यदि दत्तक बच्चे को यह कानूनी दर्जा न दिया जाए, तो उसका भविष्य “अधर में लटक जाएगा”। न्यायालय के अनुसार, दत्तक प्रक्रिया का उद्देश्य ही बच्चे को पूर्ण सामाजिक और कानूनी पहचान देना है।
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हाईकोर्ट ने माना कि जाति प्रमाण पत्र से जुड़े कानून में दत्तक बच्चों की जाति को लेकर सीधा प्रावधान नहीं है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि दत्तक आदेश और जन्म प्रमाण पत्र जैसे वैध दस्तावेजों को नजरअंदाज किया जाए। अदालत ने कहा कि किशोर न्याय अधिनियम के तहत गोद लेने से बच्चे के जैविक माता-पिता से सभी संबंध समाप्त हो जाते हैं और दत्तक परिवार से नए संबंध स्थापित होते हैं। इसलिए जाति की पहचान भी उसी के अनुरूप तय होनी चाहिए।
फैसला
हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए उपजिलाधिकारी और जाति छानबीन समिति के आदेश रद्द कर दिए। अदालत ने समिति को निर्देश दिया कि ओम दत्तात्रय आचारी को विशेष पिछड़ा वर्ग का जाति वैधता प्रमाण पत्र चार सप्ताह के भीतर जारी किया जाए।
यहीं पर अदालत ने मामले का पटाक्षेप किया।
Case Title: Mrs. Geeta Dattatray Achari vs State of Maharashtra & Ors.
Case Number: Writ Petition No. 14840 of 2022
Date of Judgment: 29 January 2026









