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सार्वजनिक सड़क पर बने धार्मिक ढांचे को हटाने का आदेश: मद्रास हाईकोर्ट ने चेन्नई निगम को दी सख्त हिदायत

A. सारथ बनाम आयुक्त, ग्रेटर चेन्नई निगम और अन्य - मद्रास उच्च न्यायालय ने चेन्नई निगम को सार्वजनिक सड़क पर निर्मित माता वेलंकन्नी मंदिर को हटाने का निर्देश दिया, यह कहते हुए कि धार्मिक आस्था अतिक्रमण को उचित नहीं ठहरा सकती।

Shivam Y.
सार्वजनिक सड़क पर बने धार्मिक ढांचे को हटाने का आदेश: मद्रास हाईकोर्ट ने चेन्नई निगम को दी सख्त हिदायत

मद्रास हाईकोर्ट ने चेन्नई के एक रिहायशी इलाके में सार्वजनिक सड़क पर बने धार्मिक ढांचे को लेकर अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ कहा कि कोई भी धार्मिक भावना सार्वजनिक रास्ते पर किए गए अतिक्रमण को जायज़ नहीं ठहरा सकती। यह मामला न्यायमूर्ति वी. लक्ष्मीनारायणन की एकल पीठ के सामने आया था, जहां याचिकाकर्ता ने निगम अधिकारियों की निष्क्रियता को चुनौती दी थी।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता ए. सरथ ने बताया कि उन्होंने नवंबर 2024 में चेन्नई के थिरु.वि.का. नगर स्थित एक मकान खरीदा था। खरीद से पहले उन्होंने देखा कि घर के प्रवेश द्वार के पास एक छोटा ढांचा बना हुआ है, जिसे अस्थायी बताया गया था।

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बाद में, मरम्मत और गृहप्रवेश की तैयारी के दौरान उन्हें पता चला कि उसी ढांचे में मदर मैरी की प्रतिमा स्थापित कर दी गई है। सरथ का कहना था कि यह ढांचा न केवल उनके घर के मुख्य प्रवेश को बाधित करता है, बल्कि पैदल चलने वालों के लिए भी परेशानी का कारण बन रहा है। इसके अलावा, लाउडस्पीकर और लाइटिंग के लिए अवैध रूप से बिजली कनेक्शन भी लिया गया था।

उन्होंने 13 सितंबर 2025 को ग्रेटर चेन्नई कॉरपोरेशन में शिकायत दी, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट का रुख किया।

मामले में तीसरे पक्ष के रूप में आर. डेनियल को शामिल किया गया। डेनियल ने दावा किया कि यह छोटा तीर्थस्थल लगभग 1995 से मौजूद है और वर्षों से स्थानीय लोग यहां प्रार्थना करते आ रहे हैं। उन्होंने कहा कि इतने लंबे समय तक किसी ने आपत्ति नहीं की, जिससे इसकी सामाजिक स्वीकृति साबित होती है।

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याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि जमीन राजस्व रिकॉर्ड में “सरकार पोरंबोक” यानी सार्वजनिक सड़क के रूप में दर्ज है। निगम अधिकारियों ने भी निरीक्षण के बाद पुष्टि की कि करीब 8 वर्ग मीटर क्षेत्र में यह ढांचा सड़क पर बना है।

कोर्ट की अहम टिप्पणियां

अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार सार्वजनिक रास्तों पर अतिक्रमण करने की छूट नहीं देता। पीठ ने कहा,

“सड़क या सार्वजनिक स्थान का कोई धार्मिक चरित्र नहीं होता। यदि वहां कोई भी ढांचा अवैध रूप से बना है, तो उसे हटाना स्थानीय निकाय का कानूनी कर्तव्य है।”

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कोर्ट ने यह भी माना कि चाहे ढांचा 30 साल पुराना ही क्यों न हो, अवैध अतिक्रमण हर क्षण एक नया कारण देता है कि उसे हटाया जाए।

अंतिम फैसला

हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए चेन्नई निगम को तमिलनाडु शहरी स्थानीय निकाय अधिनियम की धारा 128 के तहत कार्रवाई जारी रखने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि सात दिन की नोटिस अवधि समाप्त होने के बाद, यदि आवश्यक हो, तो ढांचे को हटाने की प्रक्रिया पूरी की जाए।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता और तीसरे पक्ष के बीच लगाए गए अन्य आरोपों पर इस याचिका में विचार नहीं किया जाएगा, और संबंधित पक्ष स्वतंत्र रूप से कानूनी कदम उठा सकते हैं।

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