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परित्याग साबित होते ही खत्म हुआ भरण-पोषण का दावा: केरल हाईकोर्ट का अहम फैसला

Shaji Sebastian v. Julie Joseph - केरल उच्च न्यायालय ने तलाक के मामले में सोने और धन की वापसी को बरकरार रखा, लेकिन परित्याग की पुष्टि के बाद पत्नी को दिए जाने वाले पूर्व भरण-पोषण को रद्द कर दिया।

Shivam Y.
परित्याग साबित होते ही खत्म हुआ भरण-पोषण का दावा: केरल हाईकोर्ट का अहम फैसला

एर्नाकुलम स्थित केरल हाईकोर्ट ने एक वैवाहिक अपील में स्पष्ट किया है कि यदि पत्नी द्वारा किया गया परित्याग (desertion) अंतिम रूप से सिद्ध हो जाए, तो वह पिछले भरण-पोषण की मांग नहीं कर सकती। अदालत ने फैमिली कोर्ट के उस हिस्से को रद्द कर दिया, जिसमें पत्नी को पिछला भरण-पोषण दिया गया था, जबकि सोना और धन की वापसी से जुड़े आदेश को बरकरार रखा गया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला पति शाजी सेबास्टियन और पत्नी जूली जोसेफ के बीच वैवाहिक विवाद से जुड़ा है। दोनों का विवाह वर्ष 2003 में हुआ था। कुछ वर्षों बाद पत्नी गर्भावस्था के दौरान मायके चली गई और फिर पति के साथ वापस नहीं लौटी। पति ने फैमिली कोर्ट में विवाह विच्छेद (divorce) की याचिका दायर की, जबकि पत्नी ने सोने के आभूषणों, धन की वापसी और भरण-पोषण की मांग की।

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फैमिली कोर्ट ने पति को परित्याग के आधार पर तलाक दे दिया, साथ ही पत्नी के पक्ष में सोना, धन और पिछले भरण-पोषण का आदेश भी पारित किया। इसी फैसले को चुनौती देते हुए दोनों पक्ष केरल हाईकोर्ट पहुंचे।

अदालत की प्रमुख टिप्पणियां

हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच जिसमें जस्टिस सथिश निनन और जस्टिस पी. कृष्ण कुमार ने साक्ष्यों का विस्तार से मूल्यांकन किया। अदालत ने पाया कि पत्नी के परिजनों द्वारा सगाई के समय ₹3.50 लाख की राशि दी गई थी, जिससे विवाह के लिए सोने के आभूषण खरीदे गए। इस संबंध में पत्नी और उसकी मां की गवाही को विश्वसनीय माना गया।

अदालत ने यह भी कहा कि विवाह के बाद पत्नी के अधिकांश आभूषण पति या उसके परिवार की कस्टडी में रहना असामान्य नहीं है। इस मामले में पति ने स्वयं स्वीकार किया कि आभूषण उसके पास सुरक्षित रखे गए थे।

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भरण-पोषण के मुद्दे पर अदालत ने महत्वपूर्ण संवैधानिक दृष्टिकोण अपनाया। बेंच ने कहा कि “परित्याग” शब्द की व्याख्या संकीर्ण रूप में नहीं की जा सकती। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि किसी पत्नी का परित्याग बिना उचित कारण के सिद्ध हो जाता है, तो उसका आचरण (conduct) भरण-पोषण तय करते समय निर्णायक हो जाता है।

अदालत ने टिप्पणी की,

“यदि परित्याग का निष्कर्ष अंतिम हो चुका है, तो इसका अर्थ यह भी है कि वह बिना किसी उचित कारण के किया गया था। ऐसी स्थिति में भरण-पोषण देना न्यायसंगत नहीं होगा।”

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अदालत का फैसला

हाईकोर्ट ने पति की उस अपील को खारिज कर दिया, जिसमें सोना और धन लौटाने के आदेश को चुनौती दी गई थी। अदालत ने पत्नी को ₹2 लाख की राशि और 28 तोला सोना या उसका बाजार मूल्य लौटाने के फैमिली कोर्ट के आदेश को सही ठहराया।

हालांकि, अदालत ने पत्नी को दिया गया पिछला भरण-पोषण रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि जब परित्याग का निष्कर्ष कायम है और वह बिना उचित कारण के है, तो तलाक अधिनियम, 1869 की धारा 37 के तहत पत्नी को पिछला भरण-पोषण नहीं दिया जा सकता।

इस प्रकार, हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले में आंशिक संशोधन करते हुए अपील का निपटारा कर दिया और मामले को यहीं समाप्त कर दिया।

Case Title: Shaji Sebastian v. Julie Joseph

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